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2008 में गठबंधन का अधर्म

अभी बहुत दिन नहीं बीते जब पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अपने दल को गठबंधन के धर्म की याद दिलाई थी। जनता की दृष्टि में इन दिनों वामदल और भाजपा तथा संप्रग और सपा, सब अपनी -अपनी तरह से भारतीय गठबंधनों के भीतरी अधर्म के व्याख्याकार और समर्थक या विरोधी बन रहे हैं। यूं तो युद्ध और प्रेम की ही तरह लोकतांत्रिक चुनावों के पास आने पर सब जायज बन जाता है। और दो रुपए किलो चावल, रंगीन टीवी सेटों और मुफ्त साड़ियों का वितरण, सत्तर हाार करोड़ के कृषि-ऋण की माफी, शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण सीमा का बेहूदा सीमा तक बढ़ाया जाना, खाद्यान्न, पेट्रोलियम और खाद पर सब्सिडी, मुफ्त बिजली-पानी देना जसे कदमों पर अपनी तमाम वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद, सभी सत्तारूढ़ दल आश्चर्यजनक रूप से एक-सा ही आचरण करते दिखाई देते हैं, लेकिन इस बार वामदल द्वारा विश्वास मत की प्रस्तुति के वक्त लोकसभाध्यक्ष पर पद से त्यागपत्र देकर पार्टी के साथ संप्रग सरकार के खिलाफ मत डालने के लिए जिस तरह के दबाव डाले जा रहे हैं, वह निपट अलोकतांत्रिक और संविधान की आत्मा के विपरीत है। हमार संविधान के अनुसार, संघीय लोकतंत्र में स्पीकर का पद संसद या विधानसभा में विभिन्न दलों और वैचारिक आग्रहों की निरंतर टकराहटों का नियामक और अभिव्यक्ित की आजादी और लोकतंत्र की निरंतर न्यायसंगत व्याख्या करने वाला विक्रमादित्य का सिंहासन है। और जब ब्रिटिश वास्तुकार हरबर्ट बेकर ने हमार संसद-भवन का खाका बनाया था, तो उन्होंने भी सदन में लोकसभाध्यक्ष के महत्व को देखते हुए उनके सिंहासन के नमूने पर खासतौर से ध्यान दिया था। उनके डिाायन के अनुसार, स्पीकर का आसन शेष सदस्यों के बैठने के स्थानों के ठीक सामने और ऊंचे पर अवस्थित किया गया है, ताकि जब कोई भी सदस्य बोलने को उठे तो वह सीधे अध्यक्ष महोदय से मुखातिब हो और उनको ही संबोधित करते हुए अपना वक्तव्य पेश कर। सदन का बुनियादी नियम भी यही है। दुर्भाग्य से इस बुनियादी नियम की हमार यहां बार-बार धज्जियां उड़ाई गई हैं। पीठासीन अधिकारी को संबोधित करते हुए अपनी जगह खड़े होकर अपनी बात कहने की बजाए सांसदों और विधायकों द्वारा धड़धड़ाते हुए अध्यक्ष के सामने आकर झुण्ड में अप्रिय नारबाजी करना, अधिक बात बढ़ी तो आस्तीनें चढ़ा कर एक दूसर पर कुर्सी-माइक उखाड़ कर मिसाइलों की तरह फेंकना, टी.वी. पर इसके अनेकों शर्मनाक उदाहरण जनता द्वारा देखे जा चुके हैं। लगता है कि कुछ सदस्य न तो स्पीकर की इज्जत करते हैं और न ही राष्ट्रपति या राज्यपालों की। कई बार तो हुल्लड़बाजी के चलते अध्यक्षीय भाषण तक ठीक से नहीं हो पाए हैं। इस सबके बावजूद (और शायद इसी वजह से) स्पीकर से उम्मीद कायम रही है कि वे चाहे किसी भी पार्टी से जुड़े हों, स्पीकर के रूप में वे तटस्थतापूर्वक व्यवहार करंगे। जरूरी हो तो अपने दल के भी सदस्यों को लोकतांत्रिक मर्यादा की लक्ष्मण रखाओं के उल्लंघन से रोकेंगे, हरचंद कोशिश करंगे कि विधायी काम चलता रहे। हर सदस्य को अपनी बात सामने रखने का मौका मिले। 1में सरदार पटेल के चित्र का संसद के केन्द्रीय कक्ष में अनावरण करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने यही आशा व्यक्त की थी कि स्पीकर चाहे जिस भी दल का हो, पीठासीन होकर वह दलगत राजनीति से ऊपर उठ जाता है। अत: उसका प्रमुख कर्तव्य होगा कि वह हर सत्र में न्यायसंगत ढंग से सदन में विधायी काम का सही तरह निष्पादन और छोटे से छोटे समूहों के विचारों की अनिर्बाध प्रस्तुति सुनिश्चित कराए। जब (1में एक अविश्वास प्रस्ताव की कार्रवाई के दौरान) तत्कालीन स्पीकर जी.वी. मावलंकर ने कहा था कि वे कांग्रेस पार्टी के सदस्य रहते हुए भी तटस्थता से स्पीकर का काम निभाएंगे, तो नेहरू ने उनका बिफर कर खण्डन किया और कहा था कि स्पीकर की दलगत तटस्थता सवरेपरि रहनी चाहिए। ’0 का दशक आते-आते जब सत्ता में गठाोड़ सरकारों का आवागमन शुरू हुआ तो विधानसभाओं तथा संसद में गर्मागर्म बहसों और दलगत खींचतान और बढ़ी और इसी के साथ एक स्थिरमति और तटस्थ स्पीकर की जरूरत भी। स्पीकरों ने भी तमाम वॉक अाउट और नारबाजी झेलते हुए संविधान की मर्यादा यथासंभव बनाए रखी। नवीं, दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं लोकसभाओं में तमाम राजनैतिक अफरातफरी के बावजूद जरूरी विधायी कामकाज तथा लोकतंत्र की जड़ों को जो बचाया जा सका, उसके पीछे कहीं न कहीं रवि र, पूर्णो संगमा और जी.एम.सी. बालयोगी जसे स्पीकरों के द्वारा हंगामे और शोरशराबे से भर सत्र में भी सदन के विवेकपूर्ण संचालन और पूरी तटस्थता से दी गई स्थापनाओं का हाथ था। सोमनाथ चटर्ाी एक बुजुर्ग अनुभवी सांसद तथा उसी परंपरा के वारिस हैं। वे विश्वासमत के दौरान उसी परंपरा को आगे बढ़ाएंगे, यह निर्विवाद है। तो माकपा कहीं इसी बात से सशंकित होकर उनको इस्तीफा देने को नहीं कह रही है? जिसे वे साढ़े चार साल तक समर्थन देते रहे, वामदलों का रोआं-रोआं इस वक्त उसी सरकार से इतना नाराज है कि पार्टी स्पीकर को पद त्याग करवाने और पुन: माक्र्सवादी चोला धारण करके पार्टी के अनुशासित सदस्य की बतौर सरकार गिराने के लिए मतदान को कहा जा रहा है। अमेरिकी विरोध के मुद्दे पर ऐसी उत्कट तिलमिलाहट के पीछे कहीं न कहीं यह अवचेतन बोध जरूर है कि अंतत:उनकी सारी नाराजी फिाूल साबित होने जा रही है। कई बार एक नेता की अच्छाई ही उसकी खामी कैसे बन जाती है प्रकाश करात उसकी मिसाल हैं। वे यूं माकपा के दृढ़ लौहपुरुष हैं, इस अच्छाई का लाभ पूरा देश उठा सकता था, लेकिन अपने इसी लौह गुण के चलते इधर उन्हें अपनी निजी मान्यताओं के विपरीत दिखाई देने वाला हर वक्तव्य, हर आचरण कतई गलत और दमन योग्य लगने लगा है। अत: जब उनके नेतृत्वकाल में नन्दीग्राम हुआ तो किसान-मजूरों पर बेझिझक गोली चलाई गई। अब उनके निशाने पर सुभाष चक्रवर्ती और सोमनाथ चटर्ाी जसे सम्मानित बुजुर्ग नेता हैं।ड्ढr जनता कानूनबाज नहीं होती। अक्सर वह चुनाव आने पर अपनी तरह के एक तर्कहीन और ऊटपटांग लेकिन दुनियादार ढंग से नेताओं की तस्वीर अपने जहन में बनाती है। और उसी आधार पर वोट देती है या नहीं देती। वामदलों के ताजा प्रिय दलों बसपा तथा भाजपा की वर्तमान जोड़तोड़ देखते हुए करात के फैसले से कोई भी समझदार व्यक्ित सहमत नहीं हो सकता। हेलीकॉप्टर से मंत्रियों को जेलयाफ्ता सांसदों को ‘खुश’ कराने से लेकर सांसदों की ताजा कीमत बताने तक इन दोनों ने गठाोड़ राजनीति को एक मिला-ाुला टोटका बना रखा है जिसमें सनसनीखे क्राइम, अंधविश्वास, नेता की प्रधानमंत्री संभावना का प्रश्नहीन स्वीकार और जादू-टोने तक के तत्व एक आदिम ढंग से घुले हुए दिखते हैं। क्या वामदलों में भीतरखाने अतीक अहमद या उमाकांत यादव के सद्गुणों अथवा राममंदिर या श्राइन-बोर्ड के लिए जमीन दिए जाने की कोई स्वीकार्यता है? कतई नहीं।ड्ढr स्पष्ट है कि येनकेन सरकार को गिराने के लिए ही वे इस वक्त अंध अवसरवादी बने हुए हैं। वामदलों की न्यायप्रियता और सुथरपन की जो तस्वीर आम लोगों के मन में थी, उसे इस जोड़-तोड़ ने तोड़ा है। अपनी तस्वीर संवारना अब उन्हीं के हाथ में है।ड्ढr ं

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