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माओवादियों को झटका

संविधान सभा के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति में से कम से कम राष्ट्रपति पद उसकी झोली में आएगा। लेकिन, दोनों पदों पर उसके प्रत्याशी चुनाव हार गए, जिससे माओवादियों को गहरा झटका लगा है। राष्ट्रपति पद पर पहली बार के चुनाव में किसी उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर दोबारा मतदान कराया गया, जिसमें नेपाली कांग्रेस के राम बरन यादव जीत गए। उपराष्ट्रपति पद पर मधेश जनाधिकार फोरम के परमानंद झा पहले ही चुनाव जीत चुके थे। जाहिर है कि अचानक तेजी से बदले घटनाक्रम में माओवादी अलग-थलग पड़ गए हैं, पर इस पराजय के लिए स्वयं उनका हठधर्मी रवैया जिम्मेदार है। पहले वे नेपाली कांग्रेस या यूएमएल को राष्ट्रपति पद देने को तैयार दिखे थे, पर उन्होंने कठिन शर्त थोप दी थी कि न तो गिरिाा प्रसाद कोइराला और न ही माधव नेपाल उन्हें मंजूर होंगे। यही अड़ियलपन माओवादियों को महंगा पड़ा और दो प्रमुख दलों- मधेशी जनाधिकार फोरम और सीपीएन-यूएमएल ने अंतिम क्षणों में उनके साथ गठाोड़ तोड़ दिया। माओवादियों ने घोषणा की थी कि यदि सीपीएन-यूएमएल समर्थित नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार राम बरन यादव राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतते हैं तो वे विपक्ष में बैठेंगे। अब देखना यह है कि सरकार गठन को लेकर माओवादी क्या रुख अपनाते हैं? संविधान सभा के चुनाव के बाद नेपाल को नए राष्ट्रपति का इंतजार था। जून में अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री गिरिाा प्रसाद कोइराला के इस्तीफे के बाद स्थिति जटिल बन गई थी। राष्ट्रपति के बिना किसी नई सरकार का गठन नहीं हो सकता था। अब नवनिर्वाचित राष्ट्रपति यादव के सामने सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा नई सरकार बनाने के लिए किसी ऐसे दल के नेता को आमंत्रित करना होगा, जिसके पास बहुमत हो। अत: विभिन्न दलों के बीच भावी राजनीतिक ध्रुवीकरण क्या शक्ल अख्तियार करता है, सभी की निगाहें इस पर टिकी रहेंगी। स्वाभाविक है कि सबसे बड़ी पार्टी के रूप में माओवादियों का इस पर दावा होगा, पर अचानक बदले समीकरणों ने कई सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।ड्ढr

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