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मनमोहन ने रचा इतिहास वर्तमान अभी बाकी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वाकई इतिहास रच दिया। लोकसभा में विश्वासमत हासिल करने वाले और खासतौर से कांग्रेस और इसके नेतृत्व वाली साझा सरकार के वह पहले प्रधानमंत्री बन गए। सदन में दिन भर चले आरोप-प्रत्यारोपों और सदन के बार बार स्थगित होते रहने के बीच देर शाम को हुए मतदान में उनकी सरकार ने 1मतों के अंतर से विश्वास मत हासिल कर लिया। सरकार को 275 मत मिले और विरोध में 256 पड़े। 541 प्रभावी सदस्यों के सदन में दस सदस्य गैर हाजिर रहे। उनके बहुमत में भाजपा के तीन सांसदों की कथित खरीद-फरोख्त का दाग भी लग गया। राजग सूत्रों के अनुसार, उनके 20 सदस्यों ने या तो सरकार के पक्ष में मत दिए या फिर गैर हाजिर रहे। मतदान के समय गैर हाजिर रहने वालों में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी के साथ ही अकाली दल के दो, जद यू के एक तथा भाजपा के छह सदस्य शामिल थे। कमोबेश राजग के इतने ही सदस्यों ने सरकार के पक्ष में मतदान भी किया। मजेदार बात यह कि मतदान में शामिल नहीं होने वाले राजग के कई सदस्य शाम छह बजे तक सदन में और संसद के गलियारे में दिखे लेकिन मतदान का समय करीब आने के साथ ही वे कहीं और खिसक लिए। कांग्रेस और यूपीए के लोग शुरू से ही सरकार के विश्वासमत हासिल कर लेने के प्रति आश्वस्त नजर आ रहे थे। उन्हें यूपीए से इतर नेशनल कान्फ्रेंस, उत्तर पूर्व के क्षेत्रीय दलों के समर्थन के साथ ही भाजपा और उसके नेतृत्व वाले राजग के सदस्यों के सरकार के पक्ष में मतदान अथवा गैर हाजिरी के पुख्ता आश्वासन मिल गए थे। करनाल हरियाणा से कांग्रेस के बागी अरविंद शर्मा भी अंतत: सरकार के समर्थन के लिए राजी हो गए। दिन भर सत्तारूढ़ खेमे और विपक्ष के सांसदों के टूटने और जुटने की अटकलनुमा अफवाहें भी तैरती रहीं। भाजपा के लोगों ने अपने तीन सदस्यों को सदन से गैर हाजिर रहने के लिए पेशगी के बतौर कथित तौर पर दी गई एक करोड़ रु. एक हाार रु. की गड्डियां सदन पटल पर बिखेर कर सनसनी फैलाने की कोशिश की। इसके चलते कई बार सदन को स्थगित करना पड़ा। विपक्ष इसके विरोध में प्रधानमंत्री से त्यागपत्र मांगता रहा जबकि यूपीए के नेताओं के अनुसार यकीनी हार देखकर विपक्ष ने बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन विश्वासमत हासिल कर लेने के बावजूद प्रधानमंत्री के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। करार और सरकार के पक्ष में बहुमत तो उन्होंने हासिल कर लिया और जाहिर है कि इस बहुमत के सहार अमेरिका से परमाणु करार पर उनकी सरकार को आग बढ़ने से कोई रोक नही सकेगा लेकिन अब उनके सामने सरकार के समर्थन में आए दलों और सांसदों को दिए गए आश्वासन पूरे करने होंगे। इसके लिए उन्हें शीघ्र ही अपनी मंत्रि परिषद का विस्तार भी करना पड़ सकता है।

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