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हार कर भी जीत गईं मायावती

टेलीविजन के पर्दे पर बार-बार दिखाए गए लोकसभा में नोटों की गड्डियां लहराने के दृश्यों ने और भले ही कुछ न किया हो लेकिन संप्रग सरकार की इस विश्वसनीयता को जख्म दे ही दिए। इतना ही नहीं इस पूरे प्रकरण ने देश की मुख्यधारा की दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को दागदार भी बनाया। वह भी उस वक्त जब आम चुनाव बहुत यादा दूर नहीं हैं। इसी के साथ संप्रग सरकार को गिराने की कोशिशें भले ही ढेर हो गई हों लेकिन इन कोशिशों का हिस्सा बन गई मायावती की छवि विशाल बन कर उभरी। वे एक ऐसी लड़ाई की विजेता बनी जिसमें हारने वाले यादा हैं जीतने वाले कम। मनमोहन सिंह के सर पर ताज भले ही सज गया हो लेकिन वह कांटों का ही ताज है। लेकिन इस लड़ाई की सबसे खास बात थी भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी को मिली मात। और यह मात भी एक ऐसी दलित नेता से मिली जो अचानक ही इस लड़ाई के फोकस में आ गई हैं और आने वाले महीनों में सरकार को गिराने की कोशिशों का हिस्सा बनी रहेंगी। यह उस नेता के लिए एक लंबी छलांग है, जो पिछले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपनी अद्भुत् जीत के बावजूद एक क्षेत्रीय नेता ही मानी जा रही थीं। पर मायावती की संभावनाओं की छाया अब भारतीय राजनीति पर पड़ने लगी है। हालांकि अभी तक राष्ट्रीय राजनीति की मार-काट में उनकी भूमिका हाशिये की ही बनी रहती थी- इस पर कांग्रेस, भाजपा और वामपंथी ही छाए हुए थे। अब इस बात के साफ संकेत हैं कि वामपंथी, यूएनपीए और तमाम छोटे दल संप्रग सरकार के खिलाफ जो अभियान चला रहे हैं उनकी कमान अब मायावती के हाथ आ गई है। यह सिलसिला माकपा महासचिव प्रकाश करात की मायावती से उनकी घर पर मुलाकात से शुरू हुआ था। इसके बाद क्षेत्रीय नेताओं और दलों ने भी उनकी इस संगति में सुर मिलाना शुरू कर दिया। इनमें से कुछ ने तो उनका नाम भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी पेश कर दिया। बहुजन समाज पार्टी की सव्रेसर्वा के लिए इसका काफी बड़ा प्रतीकात्मक महत्व था। पहली बार उनकी अपनी पार्टी के अलावा किसी दल ने देश के सबसे बड़े पद के लिए उनके नाम का प्रस्ताव रखा था। बसपा और मायावती ने हमेशा ही खुद को तीसरा मोर्चा बनाने की किन्हीं कोशिशों से दूर रखा था। इस लिहाज से देखें तो राष्ट्रीय राजनीति में यह उनका पहला बहुत बड़ा दांव है। यह भी सच है कि लोकसभा में जिस तरह से संप्रग को 275 वोट मिले और विपक्ष को करारी मात मिली उसने यह बात भी बता दी कि वे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में बड़ी बगावत कराने में कामयाब नहीं हो सकीं। वजह यह भी हो सकती है कि सरकार के बहुत से संसाधन इसे रोकने में लगे हुए थे। और आखिर में जब भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह जसे नेता हाथ पर हाथ धरे तमाशा देख रहे थे तो मायावती ने अकेले अपने बूते इस लड़ाई को आगे बढ़ाया। मायावती मनमोहन सिंह सरकार को लोकसभा में ही गिराना चाहती थीं, निश्चित रूप से उसका बच जाना मायावती के लिए एक झटका तो है ही। अगर ऐसा हुआ होता तो मायावती अपने को परेशान करने की उन कोशिशों का बदला लेने में कामयाब हो जाती जो समाजवादी पार्टी की शह पर केंद्र सरकार ने की थीं। आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई को उनके खिलाफ लगा दिया गया है। विश्वासमत के साथ जिस तरह के भ्रष्टाचार के आरोप जुड़ गए हैं उनके चलते सरकार के पास अब वह नैतिक अधिकार नहीं रह गया है कि वह विपक्ष के किसी नेता के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप को तूल दे। और यह नैतिक बल उसे तब तक दुबारा नहीं हासिल होगा जब तक वह एक सिरे से नया जनादेश नहीं हासिल कर लेती। अब मायावती की सबसे बड़ी राजनैतिक संपत्ति यह है कि उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार को गिराने के विपक्ष के अभियान में केंद्रीय भूमिका निभाई। और सीबीआई ने उन पर जो हल्ला बोला उसके खिलाफ उन्होंने तकरीबन सभी विपक्षी दलों यूएनपीए, एनडीए, वाम मोर्चे वगैरह का समर्थन हासिल कर लिया। कुछ हफ्ते पहले तक आप इसकी उम्मीद भी नहीं कर सकते थे। सीबीआई द्वारा दलित नेता को दबाने की कोशिश का सरकार पर उल्टा असर पड़ सकता है। खासतौर पर उस नेता पर जो विपक्ष के अभियान का हिस्सा थी और उसके अभियान को गिराने के लिए भ्रष्टचार का सहारा लिया गया। आम चुनाव अब कुछ ही महीने दूर हैं इसलिए किसी भी मामले को आगे बढ़ाना मायावती के खिलाफ बदले की भावना के रूप में ही देखा जाएगा। यह धारणा लगातार पुख्ता हो रही है कि भारत की भावी राजनीति की कुंजी मायावती के पास है। एक तरफ उन्होंने वाम दलों और क्षेत्रीय पार्टियों से नए संबंध बनाए हैं। दूसरी तरफ भाजपा और संघ के नेताओं से उनके पुराने संबंध हैं। ये दोनों चीजें उन्हें अगली लोकसभा में गठजोड़ के ढेर सारे विकल्प देंगी। इस बात में पूरा संदेह है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जमीनी स्तर पर किसी नए राजनैतिक गणित को जन्म दे सकेंगे। और इन सारी घटनाओं पर देश भर के दलितों की जो प्रतिक्रिया होगी उसे भी हमें कम करके नहीं आंकना चाहिए। टेलीविजन के जरिये संप्रग सरकार से मायावती के सारे विवाद की तस्वीरें उन तक भी पंहुची हैं। उत्तर प्रदेश के बाहर भी दलित नौजवानों के लिए वे एक आदर्श बन चुकी हैं। बसपा नेता अपनी लड़ाई कोलड़ने के लिए उत्तर प्रदेश से जितना बाहर निकलेंगी, उतना ही देश भर में उनके आधार का विस्तार होगा। और हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि देश के बहुत से राय ऐसे हैं जहां कांग्रेस दलित वोटों पर काफी यादा निर्भर है। मायवती अगर अपनी जड़ें दूसरे प्रदेशों में फैलाती हैं तो इससे कांग्रेस के लिए एक बड़ी समस्या भी खड़ी हो सकती है। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे मायावती पर पुस्तक भी लिख चुके हैं।

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