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विश्वास मत: जनता का भरोसा खोती राजनीति

इसका कारण लगातार चल रही वे अफवाहें थीं जो बता रहीं थीं कि सांसदों को वोट डालने के लिए कितने पैसे मिल रहे हैं और वोट न डालने के लिए कितने। नरसिंह राव इस मामले में काफी बदनाम हुए थे जब वे अपनी अल्पमत सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर सांसदों को रिश्वत देने के दोषी पाए गए थे। और इस बार जब भाजपा के तीन सदस्यों ने सदन के पटल पर नोटों की गड्डियां रखीं तो लगा कि नरसिंह राव के दिन लौट आए हैं। आरोप था कि ये नोट उन्हें विश्वास मत को एब्सटेन करने के लिए दिए गए हैं। मनमोहन सिंह और नरसिंह राव की तुलना बस यहीं तक हो सकती है। दोनों एक गुरु -शिष्य परंपरा में बंधे थे, हालांकि लोकसभा का दोनों का अनुभव अलग अलग ही रहा। मनमोहन सिंह को दो बार विश्वास मत लाना पड़ा। एक बार अपने शासनकाल के शुरू में अपना बहुमत साबित करने के लिए और दूसरी बार अब जब वामपंथी दलों ने उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इसी के साथ मनमोहन सिंह नेहरू-गांधी परिवार के बाहर के दूसरे ऐसे कांग्रेसी प्रधानमंत्री हो गए हैं जो दिल्ली सत्ता में पूरे पांच साल गुजारेंगे। नरसिंह राव ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे, हालांकि उनके शासनकाल की मुश्किलें यादा बड़ी थीं। उन्हें संसद के तकरीबन हर सत्र में ही एक अविश्वास प्रस्ताव का समाना करना पड़ा, और हर बार उन्होंने अपनी अल्पमत सरकार को बचा लिया। उन्होंने अपनी खामियों को अपनी खूबियों में बदल डाला और आर्थिक सुधारों का दौर शुरू किया, यही बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इस मामले में जो चीज सबसे यादा चर्चा में रही वह थी सदन में मतदान को प्रभावित करने के लिए रुपयों का आदान-प्रदान। लोगों के दिमाग में यह बात घर कर चुकी है कि जनता के प्रतिनिधि खरीदे और बेचे जा सकते हैं, इसीलिए लोगों को भाजपा के आरोपों में दम दिखाई देता है। ये आरोप कानून के सामने कितना टिक पाएंगे यह एक अलग मसला है। पर यह एक ऐसा मसला है, जिस पर राजनैतिक दलों को गंभीरता से सोचना चाहिए। राजनीतिकों की छवि सुधारने के लिए बहुत बड़े और लगातार कदम उठाने होंगे। वर्ना हमारे संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता ही गिरेगी। इस दो दिन के विशेष सत्र में छोटे दलों की क्षणभंगुर राजनीति भी चर्चा में रही। और इन्हीं की वजह से सांसदों की खरीद-फरोख्त की अफवाहें चलीं। दक्षिण के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के मामले में दिलचस्प बात यह थी कि उनके संसदीय दल के नेता बेमतलब हो चुके हैं। मसलन पिछले 25 साल से आंध्र प्रदेश की राजनीति में छाई रहने वाली तेलुगू देशम पार्टी को ही लें। जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे तो इसके करिश्माई नेता एन. टी. रामराव ने अपने संसदीय दल को बड़ी पार्टियों के आगे समर्पित कर दिया था। और तामिलनाडु की द्राविड़ मुन्नेत्र कषगम यानी डीएमके के लिए भी तबसे कावेरी नदी में काफी पानी बह गया है। इसने अपने सभी 3सांसादों को कांग्रेस के लिए परोस दिया। हालांकि दोनों में जो समझदारी बनी है उसे लेकर पार्टी में मतभेद भी हैं। मतोद के केंद्र में पूर्व संचार मंत्री दयानिधि मारन हैं। डीएमके के अध्यक्ष एम. करुणानिधि के कहने पर उनका मंत्रिपद छीन लिया गया था। उसके पहले तक दयानिधि दिल्ली में करुणानिधि की आंख और कान माने जाते थे। उनके पिता मुरासोली मारन ने 2004 में कांग्रेस के साथ गठजोड़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन बाद में मारन बंधुओं और करुणानिधि के बेटों में मतोद पैदा हो गए और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी चला। इसलिए यह सवाल उठा था कि मारन विश्वास मत पर डीएमके की व्हिप को मानेंगे या नहीं। बाकी दो दक्षिणी रायों में कर्नाटक के जनता दल एस की लोकसभा में तीन सीटें हैं। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में इस पार्टी को भारी मात मिली है। विश्वास मत के दौरान उसने वामपंथी दलों के साथ जाना ही बेहतर समझा। केरल में भी कई क्षेत्रीय दल हैं। मसलन केरल कांग्रेस एम और केरल कांग्रेस जे वगैरह। लेकिन केरल के क्षेत्रीय दल किसी न किसी फ्रंट का हिस्सा होते हैं और वे अपने फ्रंट के हिसाब से ही वोट देते हैं। वहां यूनााइटेड डेमोक्रेटिक फंट्र और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट में अनुशासन काफी कड़ा है।ड्ढr लेखिका वरिष्ठ पत्रकार है

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