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उस समय हम किंग थे

साल 2008 भारतीय हॉकी के इतिहास में दर्ज रहेगा। मार्च में पुरुष टीम क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में ग्रेट ब्रिटेन से हारी और बीजिंग ओलंपिक में भाग लेने का टिकट हासिल करने से रह गई। अस्सी साल में पहली बार ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम पदक के लिए मुकाबले मे नहीं उतरगी। एक माह बाद 24 अप्रैल को महिला टीम भी बीजिंग का टिकट पाने से चूक गई। चार दिन बाद भारतीय ओलंपिक संघ ने भारतीय हॉकी फेउरशन को भंग कर दिया और एक एड-हॉक कमेटी बना दी गई। मुंबई के बांद्रा इलाके में लीलावती अस्पताल के नजदीक एक इमारत की पहली मंजिल पर साल के लियो हिलेरी नोवेल्स पिंटो ने इस सारी गतिविधि को टूटे दिल से देखा है। जब हम उनके पास पहुंचे तो पिंटो ने कहा, ‘उन्होंने खेल को बर्बाद कर दिया है। अब कोई भी इसकी परवाह नहीं करता।’1े लंदन ओलंपिक के हर रंग के ब्लेजर और पीली ओलंपिक टाई जिसमें बिग बेन का छोटा सा स्केच बना हुआ है। ब्लेजर और टाई दोनों ही का रंग कुछ फीका पड़ गया है। क्योंकि 60 सालों के दौरान इनका इस्तेमाल लगातार नहीं हुआ है, लेकिन फिर भी इन पर कोई दाग या धब्बा नहीं है और बढ़िया ढंग से प्रेस भी हो रखी है। पिंटो 1ी भारतीय हॉकी टीम के गोलकीपर थे। तब तक हमारा एक साल का स्वतंत्र देश हॉकी की सुपर पॉवर बन चुका था। उसने 1से 1तक लगातार तीन स्वर्ण पदक जीते थे। लेकिन 1ा ओलंपिक स्वर्ण अलग था। भारत अपने झंडे के तले खेला था और उसके खिलाड़ी अपने राष्ट्रगान के सम्मान में सावधान होकर खड़े हुए थे। अपने लंदन ओलंपिक के अनुभव को बताते हुए पिंटो का उत्साह देखने वाला था। वह उस समय हंस पड़े थे, जब हमने उन्हें बताया कि हम उस टीम के दूसर सदस्यों को ढूंढने में सफल हो गए हैं और उनसे भी अनुरोध करंगे कि वे अपनी यादें हमार साथ बांटे। 1ी स्वर्ण विजेता भारतीय हॉकी टीम के खिलाड़ियों को ढूंढ निकालना ही अपने आप में एक पदक जीतने के बराबर है। इनके बार में ऑनलाइन या ऑफलाइन कोई डाटाबेस उपलब्ध नहीं है। राज्य हॉकी एसोसिएशनों को अनेक फोन करने और कई दिन तक उनके पीछे पड़ने के बाद हमें उन खिलाड़ियों के बार में पता चल सका जो इस समय जीवित हैं। पांच बचे हैं, दो कोलकाता में, एक-एक चंडीगढ़ और दिल्ली में और पिंटो मुंबई में। पिंटो के किस्से सुनाने के दौरान साफ लगा कि अनेक चोटों और बढ़ती उम्र के बावजूद उनकी यादें धूमिल नहीं हुई हैं। बलबीर सिंह सीनियर अब 84 साल के हैं और कनाडा और चंडीगढ़ में रहते हैं। बलबीर और पिंटो के लिए 1में पहला ओलंपिक था। पिंटो ने कहा, ‘मैं 1े बर्लिन ओलंपिक में भी जा सकता था, तब भी मैं देश का सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर था और मेरा चयन होना ही था, लेकिन ओलंपिक से पहले एक टूर्नामेंट में छाती से गोल रोकने के दौरान मेरी कॉलर बोन टूट गई थी। मैं तीन सप्ताह तक कोलकाता के प्रेसिडेंसी अस्पताल में भर्ती रहा था तब तक टीम बर्लिन के लिए उड़ चुकी थी।’ पिंटो ने कहा, ‘1में हॉकी फाइनल वेम्बले स्टेडियम में खेला जाना था वो भी ब्रिटेन के खिलाफ। 25 हाार ब्रिटिश दर्शक स्टेडियम में थे और भारतीय खिलाड़ी नंगे पैर खेल रहे थे। भारत 4-0 से जीत गया था और मैं आपको बता नहीं सकता कि हम कैसा महसूस कर रहे थे। हम अपने पदक लेने गए झंडे को देखा और जन गण मन गाया तो हमारी आंखों से आंसू निकल आए थे।’ टीम की औसत उम्र 20 साल थी। इसके साथ ही विश्व हॉकी में स्वतंत्र भारत के वर्चस्व की शुरुआत हो गई थी। बलबीर ने बताया कि, स्वदेश लौटने पर लोगों सड॥कों पर फूल मालाएं लेकर खड़े थे। टीम ने दिल्ली में एक प्रदर्शनी मैच खेला और दर्शकों से खचाखच भर स्टेडियम में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी आए थे।ड्ढr 84 साल के कमांडर नंदी सिंह उस समय 23 साल के थे, उन्हें याद है कि बलबीर सिंह टॉप स्कोरर थे, लेकिन वह यह बात भी पूर गर्व से बोले कि इसमें उनका और दूसर साथियों के बलबीर की तरफ फेंके पासों की भी अहम भूमिका रही थी। उन्होंने कहा, ‘आज भी हॉकी जसे टीम खेल में किसी खिलाड़ी को टॉप स्कोरर कहना उचित नहीं है, आखिर वे दूसर खिलाड़ियों से मिले पास की वजह से ही गोल कर पाते हैं।’ड्ढr 83 साल के केशव दत्त कोलकाता में रह रहे हैं। वह 1े अलावा 1े हेलसिंकी ओलंपिक में भी खेले हैं। उन्होंने अपने दो स्वर्ण पदकों में से एक 1े चीन के युद्ध में पंडित नेहरू की अपील पर नेशनल डिफेंस फंड में दे दिया था। दूसरा पदक उनके बेटे के पास इंग्लैंड में है।ड्ढr 81 साल के लेजली क्लॉडियस ने चार ओलंपिक में खेल रिकॉर्ड बनाया था। वह 1और 10 के ओलंपिक में खेले हैं। वह आज भी कोलकाता के मैदान में शाम को कस्टम के टेंट में नजर आ जाते हैं। कस्टम में उन्होंने 36 साल काम किया। उन्होंने आज के हालात पर कहा, ‘मुझे लगता है कि हॉकी के स्वर्णिम दिन गुजर चुके हैं।’ मुंबई में पिंटो उनकी बात के समर्थन में सिर हिलाकर बोले, ‘अब हम कुछ नहीं हैं, उस समय हम किंग थे।’ड्ढr

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