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संसद की बहस में चैनल का चरित्र

अखबार और टीवी फर्क विश्वास मत पर और भी स्पष्ट हो गया। साथ ही सार्वजनिक और कमर्शियल चैनलों का अंतर भी। सदन में दो दिन लगातार बहस चली, न्यूक्िलयर डील और सरकार के कामकाज पर। इसमें उन सांसदों ने भी भाग लिया जिनके बार में हम कम जानते हैं और जिनको सुनने का मौका नहीं मिलता है। जिन लोगों ने लोकसभा चैनल पर विश्वास मत पर बहस देखी और सुनी, उनको राजनीति के बार में एक नए किस्म का अनुभव मिला। जिन्होंने दूसर चैनलों पर बहस देखी, वे कुछ अलग ही अनुमान लगा पाए। जिन्होंने अखबार पढ़ा उनको शायद सबसे ज्यादा फायदा हुआ। क्या विश्वास मत सिर्फ संख्या का सवाल था? हरक प्राइवेट चैनल पर कई दिनों से, घंटों तक सिर्फ संख्या का दृश्य, और उसके बार चर्चा जारी रही। और इतने सब के बाद, एक भी चैनल नहीं था जो सही अनुमान लगा सका। जहां तक बहस की बात, तो सभी प्राइवेट चैनलों ने इसके प्रसारण को हासिल करने का इंतजाम किया था। पर किसी ने सीधा प्रसारण नहीं दिखाया, पहले दो-तीन घंटे के बाद। सदन के बाहर जो हो रहा था वह उनके लिए ज्यादा आकर्षक था। मायावती की प्रेस कांफ्रेंस, अमर सिंह की लगातार बातचीत, गोविन्दा का एयरपोर्ट में हाजिर होना, धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी से बातचीत। और टीवी वालों की अपने आप में चर्चा। आज तक ने इसे तमाशा बना दिया : ‘मनमोहन सिंह का महाभारत’। लोकसभा चैनल के बिना किसी को भी विश्वास मत का पूरा अनुभव नहीं मिलता। अगर लोकसभा चैनल और प्राइवेट चैनलों में फर्क था तो दूरदर्शन और लोकसभा टीवी में भी फर्क था। अगर कमर्शियल चैनल सनसनी को लेकर व्यस्त रहे, दूरदर्शन ने अपने आप को बिल्कुल डरपोक दिखाया। जब नोटों के बंडल आ गए स्पीकर के सामने, और दूसर चैनलों ने बार-बार इस दृश्य को दिखाया, दूरदर्शन पर लग रहा था कि कुछ हुआ ही नहीं है। उनके एंकर दूसरी चीजों की बात कह रहे थे, जसे कि कोई भी विवाद वाली घटना दिखाने की उनको अनुमति ही न हो। दूसरी बात है, कि सरकार के इतने महत्वपूर्ण अवसर को कवर करने के लिए सरकारी चैनल ने ठीक तरह से तैयारी क्यों नहीं की? लोकसभा चैनल की तरह डीडी न्यूज डिबेट का सीधा प्रसारण कर रहा था। पर जब भी स्थगन होता था, स्टूडियो पर दर्शकों को ले जाने के बजाय दूरदर्शन किसी भी तरह की फिलर्स दिखाने लगता था। क्या इतने साल बाद इतनी काबलियत नहीं है इस चैनल में कि वह स्थगन के समय उस वक्त तक हुई प्रोसीडिंग्स पर तुरंत चर्चा शुरू कर सके? चाहे दूरदर्शन हो या लोकसभा चैनल, प्रोसीडिंग्स रुक जाने पर वे किसी किस्म की चर्चा नहीं शुरू कर पाए। जब नोटों के बंडल दिखाने की वजह से स्थगन हुआ, सभी प्राइवेट चैनलों पर गरम चर्चा होने लगी, पर लोकसभा चैनल पर राज कपूर की फिल्मों की झलक दिखाई जा रही थी। अखबार और टीवी पर इस खास रिपोर्टिग के मौके पर क्या अंतर दिखाई दिया? टीवी की एक छवि हाारों शब्दों से ज्यादा कहती है, यह बात सच है। जिस तरह से तहलका की पेश की गई बंगारू लक्ष्मण की तस्वीर हमारी याददाश्त में बनी रहेगी, उसी तरह से नोटों के बंडल लोकसभा में दिखाए जाने का 22 जुलाई की छवि, हमारी राजनीति का एक प्रतीक बन गया है। यह टीवी के बिना संभव नहीं होता। मगर यह भी कहना जरूरी है कि टीवी ने राजनीति में लोगों के विश्वास को जो चोट पहुंचाई, उसे चैनलों ने पॉजिटिव दृश्य से बैलेंस नहीं किया। सदन में बहुत हंगामा हुआ, फिर भी सदस्य थे जो गंभीरता और धैर्य से न्यूक्िलयर डील तथा दूसर मसलों पर अपनी बात रख रहे थे। किसी टीवी चैनल ने इनको ठीक से दिखाना मुनासिब नहीं समझा। जब हफ्तों से देश के नागरिकों को मीडिया और नेता कहते आए हैं कि मुसलमान दूसर अंदाज से इस डील को देखते हैं, तब उन्हें नेशनल कांफ्रेंस के ओमार अब्दुल्ला और मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) के असादुद्दीन ओवेसी के भाव प्रणव भाषण को पूरी तरह से दिखाना चाहिए था। किसी भी प्राइवेट चैनल ने इनके शब्दों का पूरा प्रसारण नहीं किया। राहुल गांधी को सभी चैनलों ने बहुत बार दिखाया, पर बिहार की महिला सांसद और बाहुबली पप्पू यादव की पत्नी रांीत रांन के भाषण को किसी ने नहीं दिखाया। अखबार और टीवी में यह फर्क था कि सभी अखबारों ने बहस के भाषणों को अच्छी तरह से कवर किया, उनकी खासियतों को हाईलाइट किया, और कम जानेमाने सांसदों पर भी नजर डाली। राजनीति की संतुलित छवि कम से कम इस मौके पर अखबारों से मिली। टीवी से नहीं। टीवी वालों ने अपने ऊपर बनने वाले दबावों का भी अहसास हम सब को दे दिया। ऐसे वक्त पर एमपी को पैसे दिए जाने का किसी चैनल के पास फुटेा होना, और उसे नहीं इस्तेमाल करना, आश्चर्य की बात है। सीएनएन आईबीएन की सफाई को स्वीकार करना बहुत ही मुश्किल है।ड्ढr ं

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