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रमणीयार्थ कॉकटेल: काव्यम्

संसद में जो हुआ क्या वह मुआ ‘भ्रष्टाचार’ था? जी नहीं वह ‘रमणीयार्थ प्रतिपादक: कॉकटेल: काव्यम्’ था: वह एकदम मौलिक अपने राजनीतिक महाकाव्य का ‘पोमो’पोस्टमोडर्न तत्व था। जीवन में यह ‘पोमो तत्व’ हर जगह रहता है। उस दिन जरा हजार के नोटों की गड्डी बनकर सांसदों के कर कमलों से संसद के ‘कमल कुंड’ में सीन देने लगा। गाना गाने लगा : मनी मनी मनी! हनी हनी हनी!ड्ढr पोमा की लीला है। लोग मुग्ध हैं। वे भी जो नाराज हो रहे हैं कि वहां यह सब करन की क्या जरूरत थी? वे नहीं जानते कि पोमो भाव कोई मर्यादा बंधन नहीं मानता। इस पोमो में अपनी रमणीय राजनीति रमण करती है। राजनीति जब रमणीय हो उठती है, तो पोमो ही उसका कारक होता है।ड्ढr इस पोमो में अपना हिन्दी साहित्य है, ़इस पेामो में अपनी संसद भी है। रमणीयार्थ प्रतिपादक: संसद: काव्यम्ड्ढr इस पोमो के ग्रहण में सब कुछ है। तीनों लोक चारों युग सात अरब जनता यह पृथ्वी जगत सृष्टि सब कुछ इसी पेामा के रंग में रंगे नजर आते हैं। ये सब कहने को अलग-अलग हैं अन्यथा एक ‘तत्व से सब जग उपज्या’ है। इनके अंग-उपांगों को अलग से देखा नहीं जा सकता कि कहां कितना कौन है और कौन कितना एक दूसरे में घुसा हुआ है? मार्क्सवाद में क्या-क्या घुस पड़ा है? पूंजीवाद में क्या-क्या मिक्स हो रहा है? दलित में क्या और पिछड़े में क्या-क्या मिल रहा है। पवित्र पहचान में क्या? बेशर्म बेपहचान में क्या? माया अमर है कि अमर ही माया है? माया मनमोहिनी है कि उसी का प्रकाश है? जय सीताराम है कि जय कृष्णलाल जी की है।ड्ढr प्रोमा के इस महारास में सब नाच रहे हैं। पूंजी की विश्व पूर्णिमा है। पूंजी का चांद चमकता है, प्लास्टिक सर्जरी से उसने अपना मुंह का टेढ़ापन सीधा करा लिया है। पूंजी की शीतल चांदनी में सब शुक्लाभिसारिका रूप धारे हैं। उसकी चमक में सब कुछ है। इतना कहा जा सकता है कि सब एक दूसरे में समाए हुए हैं। यह ‘उन’ से ‘उन’ तक की यात्रा अनंत की यात्रा हो जाती है। और सीबीआई के पिता जी को कभी भी वह ‘उन’नहीं मिलता। यही तो सचाई का पोमो तत्व है, जो हर कहीं होती है, मगर मिलती नहीं है। सचाई का धंधा सब करते हैं, लेकिन वह कहीं मिलती नहीं है। यही सचाई का पोमो प्रवेश है। ‘साहित्य में पोमो विचरण कर रहा है’ जब हमन कहा था तो लोग नहीं माने थे अब सर्वत्र है तो भी मूरख नहीं मानते।ड्ढr तुसी उनका की कर लोगे ?ड्ढr जब सब प्रकार के सच इस कदर सब में घुल-मिल जाएं जो समझिए जीवन ही ‘पोमो’ है। इन दिनों आदमी हंसता-हंसता रोने- रोन को होता है, जब रोन को होने लगता है तो उसकी हद पर जाकर फिर से हंसने लगता है। और अब ता कमबख्त हंसान का धंधा ही करने लगता है। राजनेताओं ने उस दिन यही किया।ड्ढr संसद के कमल कुंड में जबसे सच नोटेश्वर बनकर पहुंचा है हममें से हरेक ईष्र्या कर रहा है कि भाई जी बाकी के चौबीस करेाड़ के नोट कहां छिपा रखे हैं? रेट तो पच्चीस का बताया था, कामरेड जी ने।पांच सौ इकतालीस गुना पच्चीस करेाड़ तो कितना बना जी? यह मायाप्लावित सच रमणीयार्थ देने वाला है। इतना-इतना मायाप्लावित सच जब सामने होता है तो राजनीति मसखरी करती लगती है। हंसाने लगती है, गुदगुदाने लगती है। रमणीय हो उठती है। सिर्फ मूरखजन की इस रमणीयता को धिक्कारा करते हैं।ड्ढr जब राजनीति हंसाने लगे, हंसाकर रुलाने लगे और फिर-फिर हंसाने लगे तो समझिए राजनीति में हास्य का जबर्दस्त काकटेल हो रहा है।ड्ढr यह कॉकटेल भी ‘पोमोटेल’ है। अपने समाज में यह दोनों इतने घुलमिल गए हैं कि पोस्टमॉडर्न स्वयं कॉकटेल बन गया है।ड्ढr कवि रघुावीर सहाय के जमाने में यह कुछ-कुछ शुरू हो रहा था तो इसे देख व कहने लगे : ‘हंसो-हंसो जल्दी हंसो हंसो कि तुम पर निगाह रखी जा रही है’। अब वक्त आ गया है, जब खतरे की घंटी है लकिन खतरे को गान की तरह गा रही है। यह जनता का अपना पोमो भावजगत है। भारत की कंडीशनों में हर कीमत पर जीते रहने वाली जनता तो हमेशा ही पोमो भाव में रहती आई है इसीलिए हास्य का समाज शास्त्र विराट् है। चराचर में है। हर पल है। बस हंसने की हंसान की तमीज चाहिए।ड्ढr संसद के पिछले दिनों कहीं लिखा देखा है:ड्ढr ‘किधर जाता है किधर घ्यान है हास्य रस की यही दुकान है।’ड्ढr पढ़ते ही समझ आता है कि दिल्ली में संसद है संसद में हंसी है। सारी जनता उसमें फंसी है। पूरे सात दिन से जनता हंस रही है।ड्ढr सुबह पार्क में जा-जाकर हंसने लगती है, दोपहर को घरों में औरतें हंसने लगती हैं, नया जन्मा बच्चा तक रोन की जगह हंसता हुआ पैदा होने लगा है। अभिमन्यु की तरह वह मां के पेट से ही संसद के ये सीन देख आया है।ड्ढr

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