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राजरंग

वक्त हर शख्स को आईना दिखा देता है..ड्ढr कल जो करते थे शिकायत, आज वहीं तारीफ करते नहीं अघा रहे हैं। काम करवाने के लिए पहले बंदरघुड़की देते थे। लगता था यहीं सिर्फ झारखंडी जनता के दुख दर्द के रू ब रू हुए हैं। यह है पंजा छाप वालों की फितरत। मतलब निकालने में पंजा छाप वाले माहिर हैं। जब दिल्ली में शांति रहीं तब तक झारख्ांड को अपनी घुड़की से अशांत किये हुए थे। मक्खन के शौकीन साहब के क्या जलवे थे, जब आते तो सबकी टकटकी उनकी ओर लग जाती कि अब हनी भाई गये। हनी भाई तो नहीं गये मक्खन जरूर गल कर मिट्टी में मिल गया। अब तो मक्खन भाई यहां आने में भी शरमाते हैं। मक्खन भाई के हां में हां मिलाने वाले के बल खा कर गिर गये हैं, उनकी वाणी में मोच आ गया है। अब उनकी बोली भी बदल गयी है। हनी का स्वाद जो उन्हें पहले कड़वा लगता था, वह अब मीठा हो गया है। अब कहते नहीं अघा रहे हैं कि हनी भाई अपना दिन पूरा करंगे। बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। पंजा छाप वाले तो अवसरवादिता के लिए पहले से मशहूर हैं। दिल्ली में कुर्सी बचने के बाद उनकी यह नीति अब जगजाहिर हो गयी। सही कहा गया है-अपने चेहर के दाग किसी को नजर नहीं आते, वक्त हर शख्स को आईना दिखा देता है।

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