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ब्लॉग चर्चा: जा हवा के झोंके और बेपनाह अंदेशे

भारत में पाठक सर्वेक्षण के मामले में एनआरएस और आईआरएस दो संस्थाएं काम कर रही हैं। इनकी पद्धति और निष्कर्षो को लेकर कई सवाल हैं। फिर भी एक बात साफ है कि मुद्रित प्रतियों में (एबीसी) और पाठक संख्या में भी हिन्दी और भारतीय भाषा के पत्र अंग्रेजी को पीछे छोड़ चुके हैं। उनका नेटवर्क अच्छा है, इसलिए हार्डन्यूज ब्रेक करने में भी अब वही बेहतर हैं। बिजनेस, टेक्नॉलाजी, साइंस और डिप्लोमेसी जैसे कुछ विषयों में अब भी अंग्रेजी के अखबारों को प्राथमिकता मिलती है। इसकी वजह वित्त और विदेश मंत्रालय में बैठे लोगों का भ्रम है। अलबत्ता एयरटेल, वोडाफोन, रिलायंस और टाटा जैसी संचार सेवाओं ने भारतीय भाषाओं के महत्व को समझा और इसकी झलक हिन्दी अखबारों में दिखाई पड़ रही है। बिजनेस वालों को भी हिन्दी नजर आने लगी है।ड्ढr देवनागरी ने रोमन का सहारा लेकर नैट पर जगह बना ली है। पिछले साल हिन्दी में जितने नए ब्लॉग बने उतने इसके पहले नहीं बने थे और अगले साल इसमें खासी वृद्धि होनी चाहिए। ब्लॉग लेखक चूंकि अपेक्षाकृत नए लेखक हैं और वे वैश्विक टाइम और स्पेस में रहते हैं, इसलिए भाषा को वे केवल उसी अर्थ में लेते हैं, जिस अर्थ में वह संचार का काम करती है। ऐसे में वे अनेक वर्जनाएं तोड़ गए हैं। इससे हिन्दी के शुद्धतावादी हितैषियों को ठेस लगती है। इससे यादा बड़ी ठेस उन्हें इस बात से लगती है कि कुछ अखबारों ने बेवजह अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। यह खेल अभी कुछ साल चलेगा। इस वर्ष न्यूयॉर्क में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में गए हिन्दी के हितैषियों ने अपनी शंकाएं व्यक्त कीं। प्रयोग करने वालों और शंकाएं व्यक्त करने वालों के मंच अलग-अलग हैं। दूसरे जो प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें अनुशासन की फिक्र नहीं है। दो-एक साल में हिन्दी की धारा इससे भी यादा चौड़ी हो जाएगी। यह बाजार की हिन्दी है। हिन्दी की मूल प्रवृत्ति बाजारू है, अंग्रेजी की तरह, इसीलिए वह लोकप्रिय है। पर अंग्रेजी के भीतर भी ज्ञान-विज्ञान, दर्शन की भाषा भी विकसित होती रही है। हिन्दी में भी वह तभी विकसित होगी जब हमें हिन्दी में चिन्तन, कला और कविता की जरूरत होगी। जरूरत बनती जाती है, भाषा ढलती जाती है। हिन्दी के चिट्ठाजगत, नारद, हिन्दी ब्लॉग डॉट कॉम, ब्लागवाणी या ऐसे ही किसी ठिए पर जाकर चिट्ठों को पढ़ें तो आनन्द आता है। भड़ास, मीडिया युग, बोल हल्ला या तमाम पत्रकारों के ब्लॉग विचारोत्तेजक बहस चला रहे हैं। वेबदुनिया और गुरुजी जैसे हिन्दी सर्च इंजन सफलता के साथ चल रहे हैं। वैश्वीकरण से लेकर साहित्य-संस्कृति और कई बार सिर्फ निजी डायरी की शक्ल के ब्लॉग भाषा और संचार के नए संसार में ले जाते हैं। मीडिया से जुड़े ब्लॉगर आमतौर पर प्रिंट के पत्रकार हैं।ड्ढr ोह खेल अभी कुछ साल चलेगा। इस वर्ष न्यूयॉर्क में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में गए हिन्दी के हितैषियों ने अपनी शंकाएं व्यक्त कीं। प्रयोग करने वालों और शंकाएं व्यक्त करने वालों के मंच अलग-अलग हैं। दूसरे जो प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें अनुशासन की फिक्र नहीं है। दो-एक साल में हिन्दी की धारा इससे भी यादा चौड़ी हो जाएगी। यह बाजार की हिन्दी है। हिन्दी की मूल प्रवृत्ति बाजारू है, अंग्रेजी की तरह, इसीलिए वह लोकप्रिय है। पर अंग्रेजी के भीतर भी ज्ञान-विज्ञान, दर्शन की भाषा भी विकसित होती रही है।ड्ढr हिन्दी में भी वह तभी विकसित होगी जब हमें हिन्दी में चिन्तन, कला और कविता की जरूरत होगी। जरूरत बनती जाती है, भाषा ढलती जाती है। हिन्दी के चिट्ठाजगत, नारद, हिन्दी ब्लॉग डॉट कॉम, ब्लागवाणी या ऐसे ही किसी ठिए पर जाकर चिट्ठों को पढ़ें तो आनन्द आता है। भड़ास, मीडिया युग, बोल हल्ला या तमाम पत्रकारों के ब्लॉग विचारोत्तेजक बहस चला रहे हैं। वेबदुनिया और गुरुजी जैसे हिन्दी सर्च इंजन सफलता के साथ चल रहे हैं। वैश्वीकरण से लेकर साहित्य-संस्कृति और कई बार सिर्फ निजी डायरी की शक्ल के ब्लॉग भाषा और संचार के नए संसार में ले जाते हैं। मीडिया से जुड़े ब्लॉगर आमतौर पर प्रिंट के पत्रकार हैं।ड्ढr ं

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