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राजरंग

ुर्सी दो, आदमी चार, यह कैसा इंसाफ ?ड्ढr कुर्सी दो और आदमी चार, बहुत बेइंसाफी है। कितनी बड़ी कुर्बानी दी है तीर-धनुष छाप वालों ने। किस-किस की नहीं सुनी। क्या-क्या नहीं सुनना पड़ा। कहां-कहां नहीं छिपना पड़ा। चार दिन तक पूर देश के साथ लुका-छिपी खेलने के बाद आखिर नेताजी प्रकट हुए थे। याद है कि भूल गये? अर भाई इ भूलनेवाली बात है कौनो? किसी जासूसी फिलिम की तरह खेल चल रहा था। एक-एक सीन में रहस्य छिपल था। अब क्या होगा? इसके बाद क्या होगा? तीर-धुनष छाप कंपनी के लोग इधर जायेंगे कि उधर। डाक्टर साहब की सरकरवा रहेगी कि जायेगी। एकदम अलबत बात हो रही थी। हर परदे पर नया सीन। हर घटना के बाद नया खेल। वाह र डेमोक्रेसी और डेमोक्रेसी का खेल। जनता परशान, नेता हैरान। खैर जो होना था हो गया। तीर-धुनष छाप कंपनीवालों की कुरबानी काम आयी। डाक्टर साहब दू गो अंगूरी उठाकर फोटवा खिंचवा लिये। जब फोटुआ खिंचवा रहे थे, उसी समय सबको बुझा गया था कि खेल हो गया।ड्ढr अब तीर-धनुष छापवाले कुरबानी की कीमत मांग रहे हैं तो का गलत कर रहे हैं। लेकिन प्राब्लम कम नहीं न है? दू गो सीटवे मिलेवाला है और आदमी चार गो हैं। इ तो बहुते बेइंसाफी है। अब दू गो आदमी कुर्सी पर बैठेगा और दू गो खड़ा रहेगा, इ अच्छा लगेगा का?

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