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वैज्ञानिक ने चंद्रमा की धूल का रहस्य सुलझाया

अपोलो चंद्र अभियान के 40 वर्ष बाद एक वैज्ञानिक ने इस रहस्य का पता लगाया है कि क्यों चंद्रमा की धूल इतनी चिपचिपी है? जिससे वैज्ञानिक उपकरण खराब होते हैं और अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य को खतरा पैदा होता है। उन्होंने निष्कर्ष यह निकाला है कि सूर्य के तेज गति से परिभ्रमण करने के कारण बहुत कम गुरुत्वाकर्षण वाले चांद की सतह से धूल उड़ती है। चंद्रमा की धूल उसकी सतह पर उतारे गए उपकरणों को खराब करती है और धूल के बादल चंद्रमा पर उतरने में बाधा डालते हैं। चंद्रमा की धूल यान से बाहर निकलने वाले अंतरिक्ष यात्रियों की पोशाक से चिपक जाती है और यान में उनके वापस लौटने के बाद शून्य गुरुवात्कषर्ण वाले यान में घूमती रहती है। धरती पर वापस लौटने की तीन दिन की यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्री की सांस में यह प्रवेश करती रहती है। इस अध्ययन के लेखक नासा के भू-भौतिक विज्ञानी ब्रायन ओ ब्रेन ने कहा कि इस धूल से बचाव का उपाय करने से पहले आपको समझना होगा कि यह इतनी चिपचिपी क्यों है? ओ ब्रेन ने 1े दौरान अपोलो 11 और अपोलो 12 अभियानों के दौरान चंद्रमा की सतह पर धूल के आंकड़ें एकत्र करने के लिए छोड़े गए उपकरणों के तथ्यों का उपयोग किया। चंद्रमा के धूलकणों का औसत आकार 70 माइक्रोमीटर होता है जो मानव के बाल के बराबर की मोटाई है।

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