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पर्दे में सच

जिस दिन लोकसभा में नोटों की गड्डियां उछाली गईं, तब उम्मीद बंधी थी कि आधा अधूरा ही सही सच लोगों के सामने आएगा। इसलिए भी कि एक निजी चैनल ने पूरी घटना का बाकायदा स्टिंग ऑपरशन किया था। पर यह हुआ नहीं और इसने ढेर सार सवाल खड़े कर दिए- स्टिंग का प्रसारण न होने के भी और उसके पीछे की नीयत के भी। स्टिंग ऑपरशन इसलिए किया गया था कि चैनल के लोगों को भाजपा के सांसदों ने सूचना दी थी कि उन्हें खरीदने के लिए पैसे दिए जा रहे हैं और वे चाहें तो इस सब को शूट कर सकते हैं। खबरों के लिए स्पर्धा जब सर चढ़कर बोल रही हो तो कोई भी चैनल इससे कैसे इंकार कर सकता था? यह स्टिंग ऑपरशन खबर तो बना मगर प्रसारण का हिस्सा बने बगैर ही। चैनल ने इस प्रसारित करने के बजाय इसके सार टेप लोकसभा अध्यक्ष के हवाले कर दिए। तर्क दिया गया कि यह संसद के विशेषाधिकार का मामला है। लेकिन यही तर्क क्यों उस समय ध्यान में नहीं आया, जब संसद में सवाल पूछने के लिए स्टिंग ऑपरशन का प्रसारण किया गया था? इसलिए यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या मीडिया का मूल काम लोकसभा अध्यक्ष को सबूत देना है या फिर सच को लोगों के सामने लाना। और अगर वह सच को सामने नहीं लाता तो यह क्यों न मान लिया जाए कि चैनल एक राजनैतिक दल का औजार बन गया। या यह भी कि अब उसे प्रसारित न करके वह किसी दूसरी राजनैतिक मंशा का औजार बन रहा है। मुमकिन है कि एक समय के बाद चैनल को लगने लगा हो कि पूरी घटना एक नाटक थी, जिसमें उसे इस्तेमाल किया गया। अगर ऐसा था तो इसे इसी रूप में पेश किया जाता जिससे राजनीति का एक दूसरा रूप सामने आता।ड्ढr अब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा अध्यक्ष से मांग की है कि प्रसारण के लिए जारी किया जाए। लेकिन मीडिया को तो यह काम बिना लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति और आडवाणी की मांग के ही कर लेना चाहिए था। स्टिंग ऑपरशन या भंडाफोड़ हमेशा ही नाजुक मसले होते हैं। इनको अंजाम देते समय मीडिया को अपनी विश्वसनीयता का हर कदम पर ख्याल रखना होता है। साथ ही अपनी बहादुरी का परिचय भी देना होता है। वरना यही लगेगा कि मीडिया किसी षड्यंत्र में इस्तेमाल हुआ है। सांसद खरीद कांड में अभी तक जो हुआ है उसने मीडिया की कोई अच्छी छवि नहीं बनाई।ड्ढr

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