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दान का पुण्य

सामवेद में कहा है कि- ‘‘हे मनुष्यों अपने हृदय की दया की भावना से इतना सीचों कि वह दया तुम्हारे हृदय से बाहर प्रवाहित होने लगे और दुखियों के समीप पहुंचकर उनके जीवन को सुखी बनाए। सब यज्ञ दानशीलता से चलते हैं। अत: हम अदानशीलता को दूर करें।’’ देव का मौलिक गुण ही ‘देवो दानात्’, दान करना, देना, स्वार्थ को छोड़ना है। हम आनन्दमय दान वाले बने। दान देने में आनन्द का अनुभव हो। दान देन का उद्देश्य यह है कि दाता को दीर्घ जीवन, प्राणशक्ित, वासनाओं के आक्रमण से बचाव तथा क्रियाशक्ित व वेग प्राप्त होता है। दान पाप से बचाने वाला सर्वोत्तम साधन है। प्रभु की प्राप्ति के लिए दो बातें आवश्यक हैं- हृदय का दया से पूर्ण होना और दुखियों की सेवा करना। ये दोनों बातें तभी हो सकती हैं जब हम अपने मन को वश में करके वशिष्ठ बनें। वेद बार-बार यह कहते हैं कि पर्वतों से नदियों के प्रवाहों की भांति दान-प्रवाहों के चलने पर मनुष्य इन धनादि पदार्थो में आसक्त नहीं होता। दान जीव की कवच ढाल बन जाता है। योगी याज्ञवल्कय न कहा था कि यज्ञ, अध्यन, दान, तप और स्वायाय, ये सब श्रेष्ठ कर्म हैं। जो दुर्बल हो, कमजोर हो, शरीर से अशक्त हो, किसी शारीरिक व मानसिक रोग का शिकार हो गया हो और उसके पास कुछ साधन न हों अथवा दरिद्र हो, पीड़ित हो, कुछ भी काम करन के योग्य न हो, किसी का सताया हुआ हो, सर्वथा अन्न-जल हीन हो, भूख-प्यास से त्रस्त हो, उसको सुपात्र समझकर खिलाने आदि और पहनाने-ओढ़ने से अवहेलना नहीं करनी चाहिए। हितोपदेश का उपदेश है कि निर्धनों का पालन करो, धनिकों को दान मत दो, क्योंकि रोगी को औषधि देना हितकारी होता है, निरोगी को औषधि देने स कोई लाभ नहीं। धर्मस्थलों में करोड़ों रुपये व सोना जमा करने से जनकल्याण नहीं हो सकता। जहाँ अपार धन होता है, वहाँ भ्रष्टाचार व विवादों का जन्म होता है।ं

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