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ब्लॉग वार्ता : विकल्प की एक जमीन

हिन्दी के तमाम ब्लॉगों में समतावादी जनपरिषद ही ऐसा ब्लॉग है जो इंटरनेट की जमीन से वैश्वीकरण की आर्थिक विचारधारा का मुकाबला कर रहा है। इसका पता है:द्धह्लह्लह्लज्झ्रझ्रह्यड्डद्वड्डह्लड्ड1ड्डस्र्न्.2orस्र्श्चrद्गह्यह्य.ष्oद्व और विरोधी हैं अफलातून। गांधीवादी। क्या आज लोगों की इस बात में दिलचस्पी होगी कि अमेरिका में 20 वर्ष पहले कोक की तुलना में दूध की खपत दुगनी थी। अब कोक की खपत दूध से दुगनी है। यह दलील यह समझाने के लिए कि उपभोक्ता संस्कृति क्या है और कोक का असर क्या है, क्योंकि कनाडा में बहस चल रही है कि स्कूलों को जंक फूड से कैसे मुक्त कराया जाए। हिंदुस्तान में इस तरह की बातें लालू यादव की कोक बनाम कुल्हड़ में लस्सी जसी बातों से हवा उड़ जाती है। इस ब्लॉग पर कनाडा की माड बार्लो का लेख है। बार्लो कनाडा में पानी के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन चलाती हैं। उनका लेख कहता है कि दुनिया में ताजे पानी की कमी हो गई है। वर्ष 2025 में विश्व की आबादी आज से 2.6 अरब अधिक हो जाएगी। इस आबादी के दो-तिहाई लोगों के समक्ष पानी का गंभीर संकट होगा तथा एकतिहाई के समक्ष पूर्ण अभाव की स्थिति होगी। तब पानी की उपलब्धता से 56 फीसदी ज्यादा की मांग होगी। और यही बढ़ती हुई मांग दुनिया भर में पानी को नीला सोना बना रही है। विश्व बैंक कहता है कि पानी का उद्योग एक खरब का हो गया है और सरकारों पर दबाव बनाया जा रहा है कि पानी का निजीकरण जल्द से जल्द करंे। एक ऐसे समय में जब प्रमुख वामपंथी दलों को सत्तावादी और समय के सांचे में फंस गए कल्पनावादी कह कर खारिा किया जा रहा है समतावादी जनपरिषद के इस ब्लॉग पर इस तरह की वैकल्पिक बातें परशान करती हैं। अब इस बात को पाठक क्यों स्वीकार करं लेकिन गगन प्रताप का यह लेख टेक्ना बाबू का उदय काफी दिलचस्प है। भारत जिस किस्म की सूचना टेक्नोलॉजी (आईटी) में लगा है उसे राजेश कोचर ने ‘सूचना छेड़छाड़’ की संज्ञा दी है। ‘यदि आईटी को हम एक नई साइकिल डिÊााइन करने जसा मानें, तो भारत को जो काम सौंपा गया है वह मात्र पंचर जोड़ने का है।’ आईटी क्रांति नहीं बल्कि कुलीकरण है। देश के होनहार युवा बंगलुरु में बैठ कर अमेरिकी बैंकों का बहीखाता पढ़ते हैं तो वो एक तरह से टेक्नो कुली का ही काम कर रहे हैं। इस लेख की प्रतिक्रिया में ब्लॉगर घुघुती बासुती लिखती हैं कि इसे पढ़कर युवा परशान हो जाएगा। हकीकत यह है कि भारत का युवा इसे किसी समाजवादी, गांधीवादी और समतावादी मान कर खारिा कर देगा। इतिहास यही है। भारत के ब्रिटिश काल में बाबूवाद को खत्म नहीं किया बल्कि पालपोस कर बरकरार रखा है। आईटी क्रांति की यह आलोचना कोई नया विकल्प तो नहीं देती लेकिन हकीकत को देखने का चश्मा तो देती है। भारत के बेरोगारों को सिर्फ नौकरी से मतलब है। भारत का बेरोगार नौजवान नर्मदा बांध को बनाने में काम आता है और टिहरी बांध को भी। बहुत कम होते हैं जो छोड़कर आंदोलन के पक्ष में खड़े होने का साहस करते हैं। यह सिर्फ एक ब्लॉग नहीं एक राजनीतिक दल भी है। समतावादी जनपरिषद भारत के चुनाव आयोग में पंजीकृत है। यह वैश्वीकरण को राजनैतिक प्रतिक्रांति मानता है। एक राजनैतिक संस्कृति की स्थापना इसका प्रमुख राजनैतिक लक्ष्य है। हिंदी प्रदेश के पन्नों पर अब वैकल्पिक बातों की जगह नहीं बची है। इसलिए विकल्प की बातें अब ब्लॉग पर पंहुच गई हैं। लेकिन इन्हीं सवालों से जूझता हुआ इसी ब्लॉग पर एक लेख है। चिट्ठे इंकलाब नहीं लाते। उन लोगों के विचार हैं जो मानते हैं कि जिस तरह बम और बंदूक से इंकलाब नहीं आता उसी तरह ब्लॉगिंग से इंकलाब नहीं आ सकता। सेथ फिंकलस्टीन के लेख में कहा जा रहा है कि- दमनकारी सरकारों द्वारा सेन्सरवेयर (सामग्री को सेन्सर करने वाले सॉफ्टवेयर) का इस्तेमाल अब वैधानिक नीति का हिस्सा बन चुका है। लेख की दलील है कि ब्लॉग कोई हल नहीं है। अत्यंत विरले जो ब्लॉग्स के जरिए ठोस असर डालने में कामयाब हो जाते हैं- उनकी कहानी को व्यापक तौर पर ‘सक्सेस स्टोरी’ के तौर पर प्रचार मिलता है। एक छोटे से प्रशंसक पाठक वर्ग की दायर के बाहर कभी पढ़े नहीं जाते हैं। अगर वोट देने का मन न भी हो तो भी समतावादी जनपरिषद के लेखों को पढ़ने में कोई बुराई नहीं। आखिर जब तक ब्लाग की ताकत पर बहस पूरी नहीं हो जाती तब तक क्यों न इस पर मिल रही जानकारियों का मजा लिया जाए। लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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