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फेडरल एजेंसी पर केंद्र का हाल

ाब भी कोई बड़ी आतंकी घटना होती है केंद्र सरकार फेडरल जांच एजेंसी बनाने की बात करती है और भाजपा कहती है कि पोटा लाओ। लेकिन यदि पिछला रिकार्ड देखें तो सत्तारु ढ़ और विरोधी दल इस मुद्दे पर सिर्फ जबानी जमा खर्च करते आए हैं। पिछले 30 वर्षों में पुलिस सुधार पर बनाई गई तमाम कमेटियां और एक संघीय जांच एजेंसी बनाने की उनकी सिफारिशों पर जमी धूल इसकी तस्दीक करती है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी 2006 में पुलिस सुधार पर दिए गए फैसले में केंद्र सरकार से फेडरल जांच एजेंसी बनाने पर विचार करने के लिए कहा था। इस बार में कोर्ट ने पूर्व अटार्नी जनरल सोली सोराबजी की अध्यक्षता में कमेटी बनाई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में लंबित इस मामले में स्वयं केंद्र सरकार ने अब तक अपना औपचारिक पक्ष पेश नहीं किया है। फेडरल एजेंसी की वकालत करने वाली केंद्र सरकार की गंभीरता का इससे सहा ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इस बार में केंद्रीय गृह सचिव मधुकर गुूप्ता ने कहा कि शपथपत्र दाखिल न करने का कारण राज्यों में सहमति न बन पाना है। सरकार सहमति बनाने के प्रयास कर रही है। सर्वोच्च अदालत के निर्देश पर सोराबजी कमेटी, बीपीआरडी (पुलिस शोध और विकास ब्यूरो) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अपना रुख लगभग एक वर्ष पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं और उन्होंने फेडरल जांच एजेंसी बनाने की सिफारिश की जोरदार सिफारिश की है। कहीं न कहीं यह पूरा मामला राजनैतिक इच्छा शक्ित का है। प्रस्तावित केंद्रीय जांच एजेंसी सिर्फ अंतरराज्यीय अपराधों की ही जांच करगी लेकिन अधिकतर राज्यों ने कानून व्यवस्था के मामले केंद्र सरकार का हस्तक्षेप बताते हुए इसका विरोध किया है। राज्यों का कहना है कि इस एजेंसी के जरिये केंद्र सरकार सीधे राज्यों में हस्तक्षेप करगी। लेकिन यदि अमेरिका का उदाहरण देंखे तो राज्यों की यह आपत्ति राजनैतिक लगती है। अमेरिकी एजेंसी एफबीआई सभी राज्यों में सीधी जांच करती है जबकि वहां के राज्यों की स्वायत्तता भारतीय राज्यों से कहीं ज्यादा है। पुलिस सुधार पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश में पैरवी करने वाले अधिवक्ता प्रशांत भूषण कहते हैं कि राज्यों के विरोध से निपटने का उत्तम उपाय है कि उक्त अपराधों को प्रतिरक्षा की तरह संविधान की 7वीं अनुसूची में डाल दिया जाए। एक बार केंद्रीय सूची में आने के बाद ये अपराध फेडरल जांच एजेंसी के क्षेत्राधिकार में आ जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह काम सुप्रीम कोर्ट भी कर सकता है।

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