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फिल्में देखकर नहीं बनता आतंकी

हिंसा और आतंकवाद की घटनाएं ..सिनेमा- टीवी के जरिए उनका सार्वजनिक प्रदर्शन और समाज की संवेदनहीन प्रतिक्रिया का बेहतरीन उदाहरण अमेरिका के एक स्कूली छात्र के प्रकरण से पता चलता है। एक गैंग वार में इस छोटे लड़के की बांह में गोली लग गई। लड़के ने आश्चर्य व्यक्त किया कि गोली लगने से दर्द भी होता है। उसे उम्मीद थी कि वह फिल्मी हीरो की तरह लड़ते हुए बिना चोट खाए गुंडों को धूल चटा देगा लेकिन अहमदाबाद में हाल में हुए धमाकों के दौरान अस्पतालों को टारगेट बनाने के पीछे की प्रेरणा हाल मे रिलीज राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘कॉन्ट्रेक्ट’ को बताया जा रहा है। 18 जुलाई को रिलीज हुई इस फिल्म मे विलेन सुल्तान अस्पतालों को भी लक्ष्य बनाता है ताकि दूसर इलाकों मे फटे बमों से घायलों का इलाज इन अस्पतालों मे न हो सके। फिल्म के लेखक प्रशांत पांडे ने कहा है कि विस्फोट वाले इसके दृश्यों की प्रेरणा उन्हें एक इजरायली फिल्म से मिली है, लिहाजा उन्हें इसके लिए दोषी न ठहराया जाए। लेकिन हमेशा की तरह इंडस्ट्री के महेश भट्ट, पहलाज निहलानी और अनुपम खेर ने इस आरोप को बकवास बताया है कि हिन्दी सिनेमा आतंकवाद को प्रेरित कर रहा है। अनुपम खेर कहते हैं कि यह बहस पुरानी है लेकिन सत्य यह है कि फिल्में देखकर कोई आतंकवादी नहीं बनता। यह संयोग ही है कि हाल मे बॉलीवुड मे कई फिल्में एसी बनीं हैं जिनकी कहानी आतंकवाद प्रेरित है। फिल्म ‘मिशन इस्ताम्बुल’ के केन्द्र में अलकायदा है तो हाइजक एक भारतीय विमान की हायजकिंग से प्रेरित है। वहीं, ‘रुसलान’ एक युवा लड़की पर मुंबई बम विस्फोट के असर की कहानी कहती है। करण जौहर की नई फिल्म ‘खान’ दुनिया के आतंकवाद पर आधारित है।

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