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संसदीय मर्यादाआें के ध्वजवाहक थे चंद्रशेखर

और 22 जुलाई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार की किस्मत तय करने वाली तारीखें थीं। दोनों ही दिन सियासत करने वाले आला नेताआें ने जमकर अपने विरोधियों पर कीचड़ उछाले और खरी-खोटी सुनाई। ऐसा लगा जैसे संसदीय लोकतंत्र की सारी मर्यादाएं व नैतिकताएं सिर्फ किताबों की ही बातें रह गई हों। बीमार सांसदों तक को लाकर संख्या बल बढ़ाने की कोशिशें एक प्रौढ़ लोकतंत्र के हमारे दावों की जैसे खिल्ली उड़ा रही थी। ऊपर से रुपयों की गड्डियों का लहराना संसद की गरिमा को नेस्तनाबूद करने में रही-सही कसर भी पूरी कर रहा था। लोकतंत्र के ऐसे खौफनाक मंजर और सांसदों व राजनीतिक दलों की कुरूप गहमागहमी के बीच भी मर्यादाआें व मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक शख्स की कमी वहां बैठे लोगों के साथ-साथ देश और दुनिया के उन तमाम लोगों को महसूस हो रही थी जिनकी निगाहें संसद पर थीं। वह शख्स थे- पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसे नाजुक अवसरों पर चंद्रशेखर की भूमिका एक अभिभावक की हुआ करती थी जिनकी बातें हर कोई गंभीरता से लेता था। दिशाहीन बहस और अबूझ विवाद को ता*++++++++++++++++++++++++++++र्*क परिणति देने में चंद्रशेखर का कोई सानी नहीं था। संसद में हमेशा अर्थपूर्ण बातचीत और स्थापित परंपराआें की हिमायत करने वाले चंद्रशेखर की नसीहतें सियासत में सौहार्द और संतुलन के टूट रहे तारों को जोड़ने में संजीवनी का काम करती थीं। दशकों तक सांसदों को संसदीय परंपराआें और मर्यादाआें की सीख देने वाले समाजवादी नेता जब संसद में खड़े होते, तो सारी निगाहें उनकी तरफ ही होतीं और वह हाथ घुमा-घुमा कर उन सांसदों को नसीहत देते जो उछल-कूद करते दिखते। बीते आठ जुलाई को उनकी पहली पुण्यतिथि थी। यह चंद्रशेखर के प्रभामंडल का असर था कि इस अवसर पर कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी समेत तमाम दलों के आला नेता उन्हें श्रांजलि देने पहुंचे थे। भारत की भौगोलिक विविधता और बहुदलीय व्यवस्था से उपजे अन्यान्य दृष्टिकोंणों व परिप्रेक्ष्यों को एकरूपता देने की कूव्वत रखने वाले चंद्रशेखर का जन्म 1 जुलाई 1ो पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कला में एमए की डिग्री ली थी। यहीं से उन्होंने राजनीति की पथरीली दुनिया में कदम रखा था। छात्र राजनीति में भी वह फायरब्रांड नेता के रूप में जाने जाते थे। राजनीतिक यात्रा शुरू करने के कुछ समय बाद ही वह सोशलिस्ट राजनीति में सक्रिय हो गए। छात्र राजनीति करते हुए वह आचार्य नरेंद्र देव के सम्पर्क में आए जो उनकी तरह ही जुझारू और जोशीले सोशलिस्ट नेता थे। पहली दफा 1में उनका संसद में प्रवेश हुआ और 1तक वह राज्य सभा के सदस्य रहे। 1में देश की अवाम और भूगोल को बेहतर तरीके से समझने के लिए उन्होंने देशभर की पदयात्रा की। यह 4260 किलोमीटर की यात्रा थी। उनकी यात्रा का मकसद लोगों के करीब आने और उनकी समस्याआें को समझने के अलावा व्यापक स्तर पर लोगों को शिक्षित करना और देश के पिछड़े क्षेत्रों में ग्रासरूट स्तर पर काम करना था। अपने उद्देश्यों को अमलीजामा देने के लिए उन्होंने इस यात्रा के दौरान उन्होंने 15 भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की थी। उनकी पदयात्रा इस कदर चर्चित हुई थी कि इंदिरा गांधी तक को खतरा महसूस होने लगा था। उनकी आक्रामक राजनीति और देश व समाज के लिए पूरी साहस, प्रतिबता और अखंडता के साथ काम करने के कारण ही मोहन धारिया और कृष्णकांत के साथ उन्हें युवा तुर्क कहा गया। चंद्रशेखर लगातार राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते गए और 10 में बीपी सिंह ने जब प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दिया, तब जनता दल के कुछ सांसदों को तोड़कर उन्होंने समाजवादी जनता पार्टी बनाई और वह कांग्रेस के सहयोग से देश के ग्यारहवें प्रधानमंत्री बने। मध्यावधि चुनाव टालने के लिए तत्कालीन कांग्रेस प्रमुख राजीव गांधी ने उन्हें समर्थन तो दे दिया लेकिन दोनों के संबंध अधिक दिनों तक अच्छे नहीं रहे और राजीव गांधी के साथ जासूसी करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने उनसे समर्थन वापस लेने का निर्णय लिया। चंद्रशेखर के पास चूंकि 60 सांसद ही थे। इसलिए उन्होंने 6 मार्च 1ो देशव्यापी टेलीविजन संबोधन में प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देने का निर्णय लिया। संसदीय परंपराआें पर पूरी निष्ठा के साथ चलने के लिए ही उन्हें 1में सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार दिया गया था। 1से लेकर चौदहवीं लोकसभा तक उन्होंने आठ बार बलिया संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। सिर्फ एक बार 1में कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी के खिलाफ उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। चंद्रशेखर ने 1में कांग्रेस ज्वाइन की और दो साल के बाद ही वह कांग्रेस संसदीय पार्टी के जनरल सेकेट्र्री चुने गए। 1में उन्होंने यंग इंडियन नामक पत्रिका की स्थापना की। वह इसके संपादक भी थे। इसके संपादकीय उन दिनों के सबसे उम्दा और प्रशंसित सम्पादकीय में से हुआ करते थे। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के दमन के कारण पत्रिका को बंद करना पड़ा था। लेकिन 1में पुन: इसका प्रकाशन शुरू हुआ। चंद्रशेखर ने हमेशा व्यक्ितत्व आधारित राजनीति की मुखालफत की और विचारधारा व सामाजिक बदलाव लाने वाली राजनीति की वकालत की। इसी वजह से आपातकाल के दौरान वह जयप्रकाश नारायण के करीब आए थे। 1से 75 के बीचपने आदर्शवादी दृष्टिकोण के कारण ही वह कांग्रेस पार्टी के भीतर विक्षुब्धों के लाडले भी हो गए थे। कांग्रेस के भीतर उनके विरोध की बढ़ती ज्वाला के कारण पार्टी की सबसे बड़ी नीति नियामक संस्था केंद्रीय चुनाव समिति और वर्किंग कमिटि के सदस्य होने के बावजूद 25 जून 1ो आपातकाल की घोषणा के बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। जेल में बिताए समय का भी उन्होंने भरपूर उपयोग किया और अपनी डायरी लिखी जिसे मेरी जेल डायरी नाम से बाद में प्रकाशित किया गया। उनकी एक और पुस्तक डायनामिक्स ऑफ सोशल चैंज काफी प्रशंसित है। आखिरकार इस जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई से उनका भी साबका हुआ और प्लाज्मा सेल के कैंसर से 8 जुलाई 2007 को 80 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

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