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जूते की अभिलाषा

इतिहास बड़ी गंदी चीज है। मंदी प्रेरित भविष्यहीन हुए इन दिनों इतिहास पल्टी मारता रहता है। कभी त्रासदी करते हुए रोने लगता है कभी कॉमेडी करके आंख मारता है। इस उत्तर आधुनिक समय में पैाराणिकता पल्टी मार रही है जूता इस तरह से चल रहा है जिस तरह से वीरगाथाकाल में कभी वीरों की तेगें बरछियां चलती थीं, किरपाणें कटारें तलवारें चलती थीं। रीतिकाल तक में जब ‘चमकती न चपला फेरत फिरंगे भट’ चलते थे जब ‘हाथिन की रैल फैल’ सेलों को हुमकाती थी। जब घोड़ों की टापों से धरती ही बादल बन छा जाती थी और ‘सूरज थारा पर पारा पारावार ज्यों’ हिलने लगता था। दुश्मनों की पत्नियों के गर्भ गिर जाया करते थे, जब सरजा वीर अक्सर ही जंग जीतने चला करते थे। और कवि महाकवि उन सीन का बखान करते न थकते थे। वही इतिहास है। वही भूगोल है। पुरान कवि अपने देशकाल के प्रति जागरूक होते थे वीरों की वीरता का आँखोंदेखा हाल लिखा करते थे समर भूमि तक में सजकर जाया करते थे। और आज जब साहित्य अधिक जागरूकों के हाथों में है, तब भी जूता पुराण पर उसकी लीला पर एक कविता नहंी लिखी जा सकी है। ये बिंदासी गद्य है कविता नहंी है। बिंदास का यह तुच्छ गद्य उस महान जूत को समर्पित है जिसने युग बदला और राजनीति की दिशा बदल दी! एक दिन जूता इकनामी को भी बदल सकता है। देख लेना।बिंदास का मन है कि वह एक जूता मंदिर बनाए। उसमें जूता देवता की स्थापना की जाए और जूता आरती गाई जाए। यह एक जूत की कामना है: मुझे पहन लेना आ क्रोधी! नेता पर देना तू फेंक!ड्ढr राजनीति की नाक काटने जिस मंच विराजें वीर अनेक!! जूत का जब से साप्ताहिक मानवीयकरण हुआ है, वह साहित्य के मानवीय अंलकार से ज्यादा महान हो गया है। जूता हमेशा चला है, लकिन उसका इतिहास नहीं लिखा गया सबाल्टर्न वाले हाशियाकृतों का इतिहास लिख करते हैं, लकिन पदतल रहने वाल का नहीं लिखते। यह उनका एलीटिज्म है। हिंदी में ‘सुदामा चरित’ में नरोत्तम दास ने सुदामा के पास ‘पांव उपानहु की नहिं सामा’ कह कर उस युग में जूत के महंगे होने की बात कही है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने ‘इब्नबतूता के जूते’ पर एक कविता लिखी है। धूमिल ने ‘मोचीराम’ लिखी है। बस्स! यह साहित्यिक एलीटिज्म है। सच! साहित्य में चप्पल का इतिहास जूत का इतिहास उसकी लीला का इतिहास लिखा जाए तो वह नितांत पददलित का इतिहास होगा। शूद्र को मनु महाराज ने पैरों से जन्मा बताया तो विमर्श पैदा हो गया जो पैरों के भी नीच कुचला जाता हो किंतु पैर की रक्षा में अपनी जान देता हो उस उपेक्षित अभाग की सुध कोई नहीं लेता। जूता शब्द की व्युत्पत्ति पर इतिहास खामोश है। उस ऊपर कभी लिखा नहीं गया। इतिहास ने जूत के साथ न्याय नहीं किया। हर आदमी जिस चीज को पहनता है, अपने चेहरे से ज्यादा पालिश मारता है चमकवाता है, जिसके फटजाने पर उसकी मरम्मत कराता है, और पुराना होने पर जिसे और बड़े वीरतापूर्ण काम में लाया जाता है, धन्य भाग जो ट्रकों, बसों ऑटोज के पीछे निरीह सा लटकता, हिचकोले खाता धुआं पीता हुआ हर ‘बुरी नजर वाल का मुंह काला’ करता है और नए बने मकान तक को बदनार से बचाता है उसका इतिहास न लिखना अपने ऐसे हितू का इतिहास नहीं लिखने के बराबर है, जो हर मौसम में साथ देता है और जिसस काम लेकर हम सब भूल जाते हैं। अब जूता कह रहा है बहुत भूल लिए मुझे अब मेरी याद करो कुर्बानी! अंग्रेजी में ‘शू’ का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें ‘जूते’ का अर्थानंद आने से रह जाएगा।ोूते में खडाऊं से रीबॉकी युग तक का इतिहास आ सकता है। जूता एक पॉपूलर सांस्कृतिक उपक्रम है। समग्र सांस्कृतिक भाषा है। नखशिख वर्णन में वह नख की ओर से शिख तक यात्रा करता है। दरबारी कवियों ने नखशिख वर्णन तो किए, लकिन हजारों रीतिकालीन नायिकाओं की चप्पलों-जूतियों का वर्णन करना भूल गए। जूत की खाितर एक प्रस्तावना लिख रहा हूं। अभी मिला नहीं है। अभागे हैं हम। बस एक इल्तिजा है, देने वाले तुझे जब देना हो तो एक न देना, दो देना जोड़ा देना। नया देना और मेरे नंबर का देना और मेरे ब्रांड का फेंकना तभी कुछ बात बनेगी एक जूता फेंकने में जूत का अपमान है। भाई को भाई से दूर करना ठीक नहीं। जूते में जकार है। इतिहास का षड्यंत्र देखिए कि बगदाद के जैदी और दिल्ली जरनैल सिंह के नामों में ‘ज’ जकार आता है। आडवाणी पर फेंकने वाले पावस अग्रवाल ने खडाऊं फेंकी है, खडाऊं पूज्य रही हैं और चप्पल से आग की चीज है। भाजपा का है और भाजपा में जकार आता है! जिनके नाम में जकार आता हो, उनमें संभावनाएं मानी जा सकती हैं। अत: आप सबसे प्रार्थना है कि एक जूता मंदिर बनाने में बिंदास की मदद करें। जूता अहिंसक है, जूता सांस्कृतिक है। जूत को लेकर जितने मुहावरे व लोकोक्ितयां हैं, वे जूता के साहित्य हैं जो मंदिर की दीवारों पर लिखी जाएंगी।

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