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मौत के आगोश में अकबरपुर मुसहरी

मौत के आगोश में है अकबरपुर टांड़ी स्थित मुसहरी के बाशिंदे। पहले से ही गरीबी और तंगहाली की मार झेल रहे यहां के दलित परिवार अब टीबी जसी खतरनाक बीमारी से बेमौत मर रहे हैं। इधर एक साल के अंदर डेढ़ दर्जन से अधिक लोग असमय ही मौत के मुंह में समा चुके हैं। हर महीने दो महीने में टीबी से उठती हैं दो तीन लाशें। अभी पांच दिन पहले ही राजेन्द्र मांझी की अर्थी उठी है। 20 वर्षीया ज्ञांति भी टीबी से पूरी तरह जकड़ी अंतिम सांसें गिन रही है। बदन सुख कर कांटा हो गया है। ग्रामीणों की माने तो अगला नंबर इसी का है।ड्ढr ड्ढr इससे पहले एक वर्ष के अंदर मुन्दरी देवी, जामुन मांझी, जानार्दन मांझी, श्विलखन मांझी, मितरनिया देवी, राजेन्द्र मांझी राम केवल माझी, जमुना मांझी, छोटन मांझी, लालबहादुर मांझी आदि टीबी से मर हैं। अभी भी बस्ती में तकरीबन 20 लोग ऐसे हैं जो टीबी हैं। टीबी का कहर और बस्ती में हर पल मौजूद मौत की अदृश्य काली छाया का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करीब सवा सौ इस दलित बस्ती में सौ मर्द भी नहीं दिखे। जो हैं भी वो कमा नहीं सकते। क्योंकि बीमारी ने इन्हें कमाने लायक भी नहीं छोड़ा। ऐसे में यहां के टीबी पीड़ितों को खाने के भी लाले पड़ने लगे है।ड्ढr ड्ढr ग्रामीणों ने बताया कि कई बार सूचना देने के बावजूद कभी यहां के पीड़ितों की सुधि नहीं ली गई। वैसे एक दो बार कुछ लोग इलाज के लिए पालीगंज अस्पताल गए। एक्सर हुआ, दवा भी मिली, लेकिन फायदा नहीं हुआ। अब लोगों के पास इतने पैसे भी नहीं है कि ये लोग बार-बार पालीगंज जाएं। क्योंकि एक्सर बाहर से कराना पड़ता है। वैसे गांव में ही एक एडिसनल पीएसी भी है, लेकिन ग्रामीणों की मानें तो इसमें पदस्थापित डाक्टर नहीं आते। एएनएम कभी कभी आती हैं पोलियो की दवा पिलाने। ये तो थी यहां चिकित्सा इंतजामात की जमीनी सच्चाई। बुनियादी सुविधाओं से भी अबतक महरूम हैं यहां के बाशिंदे। कहने को तो कुल 64 इंदिरा आवास हैं लेकिन रहने लायक एक भी नहीं। 1में बने अधिसंख्य आवास जर्जर हो चुके हैं। कई ध्वस्त भी हो गए हैं। मजबूरन दरबानुमा झोपड़ियों में जिंदगी गुजारने को विवश हैं अकबरपुर मुशहरी के बाशिंदे।

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