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अमेरिकी नाराजगी

पाकिस्तानी खुफिया संगठन आईएसआई पर आतंकी हिंसा फैलाने के आरोप सिर्फ अफगान राष्ट्रपति कराई और भारत ही नहीं लगा रहे हैं, बल्कि अमेरिकी खुफिया संगठन सीआईए ने भी अब इसकी पुष्टि की है। सीआईए के उपनिदेशक स्टीफन ने पाक अधिकारियों को सबूत देकर बताया कि आईएसआई अधिकारियों और आतंकवादी संगठनों के बीच गहर संबंध हैं। उन्होंने कहा कि ये दोनों साठगांठ कर अफगानिस्तान और पाक के कबाइली इलाकों में आतंकी हिंसा फैला रहे हैं। आईएसआई की कारगुजारियों पर अमेरिका ने पहली बार इतनी कड़ी फटकार लगाई है। इसका कारण यही लगता है कि अफगानिस्तान में आतिंकयों के खिलाफ नाटो सेनाओं की कार्रवाई में आईएसआई की संदिग्ध भूमिका पर अमेरिकी सहनशक्ित बर्दाश्त के बाहर हो गई है। प्रधानमंत्री गिलानी के नेतृत्व में नागरिक सरकार बनने के बावजूद यह खुफिया संगठन कितना शक्ितशाली है, इसका नजारा हमने चंद रो पहले उसे गृहमंत्रालय के अधीन लाने और फिर पुरानी स्थिति लागू करने के फैसले के रूप में देखा था। पाक में सत्ता के कई प्रतिस्पर्धी केंद्र हैं- सरकार, सेना, आईएसआई, जेहादी तत्व आदि। इसके चलते यह देश आज तक अपना सही रास्ता तय नहीं कर पाया। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि गिलानी सरकार बर्खास्त जजों की बहाली के बार में अभी तक कोई फैसला नहीं ले पाई? जबकि सरकार को बाहर से समर्थन दे रही नवाज शरीफ की पार्टी लगातार यह मांग कर रही है। दुनियाभर के लोकतांत्रिक देशों में खुफिया एजेंसियां नागरिक सरकार के अधीन होती हैं, पर पाक में आईएसआई सेना का हुक्म मानती है। सत्ता के इतने अधिक केंद्रों का ही दुष्परिणाम है कि पाक लगातार एक नाकाम राज्य की दिशा में बढ़ रहा है। अफगानिस्तान में सोवियत-समर्थक सरकार हटाने और भारत को तंग करने के लिए उसने तालिबानी व कट्टरपंथी मजहबी तत्वों को पाला और पोसा- बिना यह सोचे कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां ते होय। इसके बुर नतीजे अब स्वयं उसे अपनी स्वात घाटी और कबायली इलाकों में भुगतने पड़ रहे हैं। इस तरह के कारनामों से पाक ने समय रहते कोई सबक नहीं लिया तो हालात दिन-ब-दिन और बिगडेंगे ही।

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