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बमकांड: बेंगलुरु और गुजरात के विस्फोट का फर्करु

दो मुख्य राजनीतिक दल और कुछ अन्य दल दोषारोपण के खेल में इस तरह सक्रिय हो गए, जसे उन्हें मालूम ही न हो कि राजनीतिक पक्षपात उस महाविपत्ति का जवाब नहीं है, जिसका सामना हम लगभग तीन दशक से कर रहे हैं। इन सभी जाने-पहचाने घटनाक्रमों के बीच कुछ बातें स्पष्ट नजर आती हैं। बेंगलुरु के विस्फोटों को संभवत: दो कारणों से मामूली माना गया था। पहला, सभी विस्फोट कम शक्ितशाली क्षमता के थे। दूसरा, इनमें सिर्फ एक व्यक्ित की मौत हुई और घायलों की संख्या 50 से ज्यादा नहीं थी। अहमदाबाद और गुजरात के अन्य हिस्सों में जब इसी तरह के बम धमाके हुए.तभी उनकी गंभीरता के बार में देश चौंक उठा। बेंगलुरु के धमाके यह हकीकत सामने लाने में विफल रहे कि वहां 15 मिनट के भीतर आठ विस्फोट हुए- औसतन प्रत्येक दो मिनट के भीतर एक विस्फोट, जबकि गुजरात के विस्फोट औसतन 15 मिनट के अंतराल पर हुए थे। प्रशासन की ऊटपटांग गणना के चलते किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि आतंकवादी कार्रवाई के व्यापक जाल का बेंगलुरु उतना ही महत्वपूर्ण केंद्र था और उसका इरादा हमारी सामाजिक, राजनीतिक और गवर्नेस व्यवस्थाओं को आघात पहुंचाना था। गुजरात के बम विस्फोटों के अलावा, बेंगलुरु से 70 किमी. दूर स्थित चेन्नापटना में लगभग आठ किग्रा. विस्फोटक पदार्थो की बरामदगी ने बेंगलुरु के धमाकों के बार में धारणा बदली। असल में, अपने खिलौनों के लिए मशहूर चेन्नापटना में एक बम विस्फोट हुआ था। कमजोर शक्ित के इस विस्फोट में न तो कोई मारा गया, न ही कोई घायल हुआ और उसकी चर्चा स्थानीय अखबारों के सिर्फ अंदर के पृष्ठों पर हुई थी। आश्चर्य यह है कि देश के आईटी हब माने जाने वाले बेंगलुरु के विस्फोटों के महत्व का अहसास करने में न केवल प्रशासन के अधिकारी नाकाम रहे, बल्कि स्थानीय लोग भी अविचलित की तरह नजर आए। आम जनता की प्रतिक्रिया सदमे और चिंता से अधिक कुतूहल की थी। चेन्नापटना में विस्फोटक सामग्री की बरामदगी और गुजरात में सिलसिलेवार बम विस्फोटों ने माहौल में बदलाव ला दिया। अपनी सुरक्षा के प्रति लोग अत्यधिक चिंतित हो उठे और संदिग्ध बमों के बार में पुलिस को फोन आने लगे। बेंगलुरु, गुजरात के शहरों और जयपुर में हुए विस्फोट एक जसे थे। इन तीनों मामलों में बम बनाने के लिए एक जसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया, वे कम शक्ितशाली बम थे, कम समय के भीतर ही सिलसिलेवार विस्फोट हुए थे और सुनियोजित तरीके से किए गए थे। बेंगलुरु में जानमाल का नुकसान कम क्यों हुआ? स्पष्ट है कि क्रूड बम रखने के लिए स्थानों का चयन दोषपूर्ण था। जिस किसी व्यक्ित ने बेंगलुरु की एक बार भी यात्रा की है, वह इस महानगर के भीड़भाड़ वाले स्थानों को जान सकता है- ब्रिगेड ग्राउंड्स, महात्मा गांधी रोड, विधान सौंध आदि। यह मुमकिन नहीं है कि बम विस्फोट में दक्षता रखने वाले आंतकवादी गुटों को इनके बार में पता न हो। भीड़भाड़ वाले इन जाने-पहचाने स्थानों के बावजूद शहर के अपेक्षाकृत कम आबादी वाले और महत्वहीन स्थानों में बम रखे गए थे। ऐसा क्यों? आतंकवाद निरोधक गतिविधियों से जुड़े स्रेतों का कहना है कि इस क्षेत्र में आतंकी गुटों को स्थानीय समर्थन की जरूरत होती है। बेंगलुरु में उन्हें यह समर्थन नहीं मिलता, जो यहां हुए बम विस्फोटों के इतिहास से भी जाना जा सकता है। इस लिहाज से अहमदाबाद या सूरत की तुलना में बेंगलुरु भिन्न है। इन शहरों में एक दर्जन आतंकी ठिकानों के बावजूद बेंगलुरु में एक भी ठिकाना ऐसा नहीं है, जहां आंतकियों को स्थानीय समर्थन मिलता हो। फिर, आतंकवादी संगठन बेंगलुरु को क्यों निशाना बनाते हैं? संभवत: सनसनी फैलाने की उम्मीद में। बेंगलुरु में कई देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर हैं और उनके कारोबारी हित हैं। एक बड़ा विस्फोट अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करगा और इसके लोभ से वे बच नहीं पाते। स्थानीय लोगों को भर्ती न कर पाने का एक अन्य कारण यहां सांप्रदायिक विद्वेष का नगण्य होना है। देश के अन्य भागों की तुलना में यहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोग आर्थिक रूप से समृद्ध हैं। इस समुदाय पर ज्यादतियों के उदाहरण इने-गिने हैं और इसके चलते विभिन्न समुदायों के बीच मनमुटाव का कोई कारण नहीं है। यह वह सबक है, जिसे हमार राष्ट्रीय नेताओं को सीखना चाहिए।ड्ढr लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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  • Web Title: बमकांड: बेंगलुरु और गुजरात के विस्फोट का फर्करु