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राजनीति का नाट्यशास्त्र

हमारे देश में विचित्र किन्तु सत्य के ढेरों प्रमाण हैं। यँू भी सरकार बचा कर डील बचाने वाले राजा को धीर प्रशांत नायक कहा जाता है। राजा के अन्य मुंहलगे ताजा सहायक अपने चंचल चाल-चलन के कारण धीर दलितों की श्रेणी में आते हैं। संस्कृत नाट्य साहित्य में जो राजा ज्यादा टाइम रनिवास को दे उसे नायक और जो राजा के कार्यक्रमों से असहमत हो उसे विदूषक कहा गया है। रामराज्य में भी जिसने सृष्टि का पहला स्टिंग आपरशन किया था वो प्रथम पत्रकार एक धोबी था। आलोचना भी साहित्य में उसी घटना से आई। सीताजी पर लांछन लगाने की इस खोजी पत्रकारिता ने रामायण का सुखान्त ही पलट दिया। ऐसी पलट परम्परा भारतीय संसद की शोभा भी है। इधर राजनीति के नाट्यशास्त्र में कविता से समकालीनता छीनकर वहाँ सांसदों की समसामयिक सार्थकता चस्पा कर दी गई है। कृपया मेर जटिल शब्दों में न जाएँ उनके अनर्थ खोजें। संसद में नोटों की गड्डियों को सामूहिक रूप से उछालना आंगिक, कोरस में नार लगाना वाचिक, गले में भगवे दुपट्टे पहनना आहार्य और संयुक्त रूप से यह उस सात्विक भाव का प्रतीक है जो पछाड़ खाते अभिनय के अन्तर्गत आता है। भूतपूर्व भरतमुनि ने भ शब्द से भाव, र शब्द से रस और त शब्द से ताल को परिभाषित किया था। कालक्रम के अनुसार अब वो बदल गया है। याने भ शब्द से भ्रष्टाचार, र शब्द से रिश्वत और त शब्द से तिकड़म हो चुका है। परम्परा में प्रयोग न हो तो परिवर्तन तुच्छ होने लगता है। सरकारी तौर कहा जा सकता है कि सबके सामने इज्जत सुसरी बचे न बचे जान तो बची। जिस बेचारी के पीछे कमंडल, त्रिशूल और हंसिया हथौड़ा हाथ धो के पड़े हों वो भला जान बचाये या इज्जत देखे। नाट्यशास्त्र में अभिनय के ऐसे सार कर्म गर्भगृह में होते हैं। संसद लगभग वही है। नाट्यशास्त्र में कथोपकथन वे संवाद हैं जिन्हें बोला नहीं जाता समझा जाता है। ये खरीद-फरोख्त की भाषा है जो रूमाल के नीचे हाथ मिलाकर अनेक बिम्बों और प्रतीकों की रचना करती है। जैसे-तुम मुझे मंत्री बनाओ मैं तुम्हारा समर्थन करूँगा। या कि तुम मुझे नोट दो मैं तुम्हें वोट दँूगा। यही पवित्र पावन संवाद भारत माता के उन्नत भाल को पहले दिव्य और बाद में भव्य बनाते हैं। आधुनिक नाट्यशास्त्र में विश्वासघात को चित्रकला, धोखा देकर स्तब्ध कर देने को मूर्तिकला और दुश्मन को दोस्त बनाने के अभिनय को नाट्यकला कहते हैं। इस अस्तबल में घोड़ों के लतियाव को रासलीला कहा गया है। रामलीला तो यदि हुई तो सेतुसमुद्रम में ही होगी।

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