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समता की चेतना

बुद्ध की करुणा हो या महावीर का प्रम, माक्र्सवाद हो या गांधीवाद- हर विचार क अंदर समता उद्गम क रूप मं मौजूद है। जैन धर्मगुरु आचार्य महाप्रज्ञ का तो कहना ही है कि जागरूकता का अंतिम बिंदु है समता। यह जागरूकता का ही परिणाम है कि किसी को भी विषमता मान्य नहीं है। खासकर सामाजिक और आर्थिक विषमता। इन दोनों तरह की विषमताओं न ही आत्महत्या की प्रवृत्ति को पनपाया है। मगर दार्शनिकों, विचारकों तथा अध्यात्म पुरुषों की मान्यता है कि जब तक विषमताओं, कुरीतियों और बुराइयों की जड़ को समाप्त नहीं किया जाता, तब तक स्वस्थ समाज क गठन की कल्पना साकार नहीं होगी। उन्होंन इसलिए चित्त की स्थिति को समतामय बनान पर जोर डाला है। यह कठिन है, लकिन अगर चित्त को समतामय बनान का सामूहिक अभियान प्रारंभ किया जाता है तो उसका प्रतिबिम्ब समाज पर तुरंत पड़ना शुरू हो जाएगा। विषमता एक स्वभाव बन चुकी है। इसी न सुख और दु:ख, लाभ और नुकसान, मान और अपमान की समानांतर सत्ता बना दी है। इस ही संसार कहा जाता है। जब तक य जोड़ वाल शब्द ़एक नहीं हो जात, दृष्टि मं परिवर्तन नहीं आ पाएगा। संसार का हर दर्शन मानता है कि सुख और दु:ख या मान और अपमान को अगर जीवन की आदत बना लं तो न इतना तनाव होगा और न आत्महत्या की नौबत आएगी। सुख मिल तो खुश हो जाना और दु:ख आए तो निराश हो जाना- दोनों ही स्थिति समता की राह की बाधा है। सुख क साथ अहं की ग्रंथि और दु:ख क साथ हीनता और हताशा की ग्रंथि जुड़ जाती है। जो चित्त की समता क साथ आग बढ़ हैं, उन्हं महान आदर्श माना गया है। विषमता का जीवन जीन वालों का भी इतिहास मौजूद है, लकिन उन्हं कभी आदर्श नहीं माना गया। चतना का जागरण विषमता क अंत की शुरुआत है। इस जागरण को सामूहिकता की ओर ल जाना होगा।

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