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आजादी के 60 साल बाद भी किसान बदहाल

आजादी के 60 साल बाद भी किसानों की स्थिति नहीं सुधरी है। भू-स्वामित्व की स्थिति आज भी पहले की तरह ही है। किसान विभिन्न दुष्चक्रों में फंसे हैं। अन्नदाता होते हुए भी उनके पेट खाली हैं। पूंजीपति और बहुराष्ट्रीय कंपनियां उनके लिए नये संकट पैदा कर रहे हैं।ड्ढr ग्लोबलाइजेशन ने कृषि को प्रभावित किया है। सरकारी बैंक भी व्यापारी हो गये हैं। कृषि संबंधी नीतियों से किसानों का भला नहीं हो रहा। उक्त बातें रांची यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में वक्ताओं ने कही। आयोजन सेंट्रल लाइब्रेरी में किया गया था। विषय था भारतीय किसान संदर्भ प्रेमचंद और राहुल सांकृत्यान। सेमिनार का उद्घाटन करते हुए वीसी प्रो एए खान ने कहा कि यदि साहित्य न हो, तो दुनिया बर्बाद हो जायेगी। प्रेमचंद की लेखनी में मौजूद भावुकता, उन्हें हमेशा प्रासंगिक बनाये रखेगी। कोलकाता यूनिवर्सिटी के डॉ राजशेखर बसू ने कहा कि किसानों की खराब हालत का सबसे बड़ा कारण है कि उनके विकास का कोई मॉडल नहीं बना। रवींद्र भारती के हितेन पटेल ने कहा कि एसे विकासवादी आतंकवादी हैं, जो विकास की बात करते हैं, लेकिन विकास कैसे हो, यह नहीं बताते। इससे पहले एचओडी डॉ रविभूषण ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ माया प्रसाद ने किया।ड्ढr डॉ माया हुईं रिटायरड्ढr हिंदी विभाग की शिक्षिका डॉ माया प्रसाद 31 जुलाई को रिटायर हो गयीं। विभाग द्वारा गुरुवार को आयोजित सेमिनार के दौरान ही उन्हें सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के संचालन के दौरान भी कई बार डॉ प्रसाद भावुक हुईं। उन्होंने विभाग से जुड़े अपने अनुभव याद किये।

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