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टीवी चैनलों की साख का सवाल

इन दिनों खबरिया चैनल सीएनएन-आईबीएन के प्रधान संपादक के सामने ढेर सारी मुश्किलें हैं। 22 जुलाई को जबसे चैनल ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस द्वारा भाजपा के सांसदों को खरीदने की कथित कोशिशों का स्टिंग ऑपरशन किया है, वे परशानी में हैं। चैनल ने स्टिंग ऑपरशन को प्रसारित न करने का फैसला किया था। इस फैसले के लिए चैनल की नीयत पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। अफवाहों का जोर है, प्रेस क्लब की गप्पबाजी हर तरफ सच बन कर खड़ी हुई है। चैनल की साख और निष्पक्षता सब दांव पर है। अगले दिन चैनल ने पांच घंटे की बातचीत के बाद स्टिंग के सारे टेप लोकसभा अध्यक्ष के हवाले कर दिए। कारण बताया गया कि उसका यह खोजी अभियान पूरा नहीं हो सका था। लेकिन इसे लेकर मीडिया में जो बहस चली, उसमें ज्यादातर की धारणा यही थी कि चैनल को इसका प्रसारण करना चाहिए था। भले ही इसके लिए इसमें जगह-ागह सफाई दी जाती, लेकिन प्रसारण तो किसी कीमत पर किया ही जाना चाहिए था। टेलीविजन एंकरों, बड़े संपादकों, यहां तक कि समाज के महत्वपूर्ण लोगों व सभी की राय थी कि यह देश का सबसे बड़ा और सबसे परशान करने वाला राजनैतिक भ्रष्टाचार का मामला है और अगर इसका प्रसारण नहीं होता है तो लोगों का मीडिया पर अविश्वास बढ़ेगा। राजनैतिक दलों को छोड़ दें तो मीडिया ने इस खबर के पीछे की नीयत को कहीं चुनौती नहीं दी। न ही इसके प्रसारण को लेकर नीतिशास्त्र या मूल्यों की कोई बहस ही छेड़ी। आमतौर पर स्टिंग ऑपरशन के खबरिया महत्व को देखते हुए यही महसूस किया गया कि चैनल ने एक ऐसे मौके को खो दिया जिसका लोग सपना देखा करते हैं। एनडीटीवी पर इसे लेकर जो बहस चली, उसमें इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता का कहना था कि एक खबरिया चैनल की जिम्मेदारी अपने दर्शकों के प्रति होती है, इसलिए इसका प्रसारण होना चाहिए था, जबकि पॉयनियर के चंदन मित्रा मानते हैं कि उस शाम इसका प्रसारण नहीं होना चाहिए था क्योंकि तब यह माना जाता कि चैनल किसी का पक्ष ले रहा है, लेकिन अगले दिन इसका प्रसारण होना चाहिए था। भारत में स्टिंग पत्रकारिता के अगुवा तहलका के तरुण तेजपाल का कहना था कि चैनल को सार्वजनिक हित के सिद्धांत का पालन करते हुए इसका प्रसारण करना चाहिए था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस ऑपेरशन की सामग्री को नहीं देखा जा सका है, इसलिए उस पर किसी तरह की टिप्पणी करना जायज नहीं होगा। इस सारी बहस में फंसे चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई ने इसका प्रसारण न करने पर सफाई दी। उनका कहना था कि ‘हमने इसे न दिखाने का फैसला इसलिए किया क्योंकि हमें लगा कि यह खबर अपने आप में पूर्ण नहीं है और विश्वसनीयता की पत्रकारिता सटीकता पर निर्भर होती है तेजी पर नहीं, तथ्यों पर आधारित होती है सनसनी पर नहीं, वह खबर देती है आरोप और मान्यता नहीं।’ लेकिन सरदेसाई ने इस संभावना से इनकार नहीं किया कि भविष्य में चैनल इसे दिखा भी सकता है। पूर्व महान्यायवादी हरीश साल्वे ने भी इस मत का समर्थन किया है। हो सकता है कि चैनल के दर्शक इससे सहमत न हों, लेकिन अंत में उन्हें कम से कम इसकी एक सफाई तो मिल ही गई। हो सकता है कि चैनल इस तरह की खोजी पत्रकारिता के लिए एक मानक तय कर रहा हो। स्टिंग का माध्यम आजकल आम हो गया है। पिछले कुछ समय में इसका बहुत ज्यादा उपयोग और दुरुपयोग हुआ है। यह सब इतना ज्यादा हुआ है कि लोग इसे पत्रकारिता का मानक मानने लगे हैं। आजकल की राजनीति में जिस तरह के घपले घोटाले होते हैं, उसमें जिम्मेदारी भरी पत्रकारिता का तर्क ही प्रसारण रोकने का अकेला कारण नहीं बनना चाहिए। चैनल का यह कहना कि इस घूस कांड के कई सिर किसी अंजाम तक नहीं पहुंच रहे थे, और प्रसारण से पहले तथ्यों की जांच और उनका मिलान जरूरी था- यह सब कुछ यही बताता है कि आखिर में चैनल ने खुद को इस विवाद से दूर रखने का फैसला किया। इसके पीछे हितों का टकराव भी हो सकता है। मशहूर वकील और कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने सूचना अधिकार कानून के तहत इसके टेप को जारी करने के लिए याचिका दायर की है। उनका तर्क है कि सार्वजनिक हित कॉपीराइट से ज्यादा बड़ी चीज है, इसलिए हो सकता है कि महीने भर में लोगों को पता चल जाए कि माजरा क्या था।

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  • Web Title: टीवी चैनलों की साख का सवाल