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भिवानी से बीजिंग तक

निशानबाजों के बाद बीजिंग ओलंपिक में पदक की किसी ने उम्मीद जगाई है तो वे हैं मुक्केबाज। पांच मुक्केबाज या कहें पांच पांडव ओलंपिक सफर पर निकल चुके हैं। आज तड़के ही ये मुक्केबाजी दल बीजिंग के लिए रवाना हुआ। खास बात यह है कि इनमें स चार मुक्केबाज भिवानी साई संेटर के हैं। इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि ये चारों ही मिडिल क्लास फेमिली से हैं। किसी के पिता जेल में वार्डन हैं तो किसी के हरियाणा रोडवज में ड्राइवर या फिर कंडक्टर। ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर चुके जितन्दर के पिता तो छोटे से जमींदार हैं जिनके खाते में मुश्किल से चार-पांच एकड़ जमीन होगी। भिवानी को मुक्कबाजी का गढ़ माना जाता है। मुक्केबाज अखिल कुमार (54 किलो), जितेन्दर (51 किलो), दिनेश (81 किलो), विजेन्दर (75 किलो) और ए.एल. लाकरा (57 किलो) ओलंपिक पदक का सपना पूरा करने के लिए बीजिंग पहुंच चुके हैं। इन पांच मुक्केबाज में ए.एल. लाकरा ऐसे मुक्कबाज हैं जिन्हंे मुक्कबाजी विरासत में मिली। अंतरेश लाकरा के पिता अर्नस्ट लाकरा भी मुक्केबाज रहे चुके हैं। इस समय वे जमशदपुर के टाटानगर संेटर में मुक्कबाजी कोच हैं। अखिल की बात करंे तो उन्हें हारना पसंद नहीं है। किसी भी टूर्नामंट में हिस्सा लंे यदि व स्वर्ण नहीं जीत पात तो उस वे अपनी हार ही मानते हैं। बीजिंग रवाना होने से पहले उन्होंने कहा, ‘मुझे हार पसंद नहीं। मेर साथी कहते हैं, मैं तो जीत का लालची हूं। वाकई यह सच है। मुझे फिल्म अशोका का डायलॉग अच्छा लगता है। जीतो चाहे छल से या बल से, लेकिन जीतो।’ अखिल के पिता हरियाणा जेल मंे वार्डन हैं। अखिल के साथ ही विजेन्दर से भी इस ओलंपिक में पदक की उम्मीद लगाई जा रही है। दोहा एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीत चुके विजेन्दर ने बीजिंग के लिए रवाना होने से पहले कहा, दबाव कोई नहीं है। अपनी ओर बेस्ट करंेगे। बाकी ड्रॉ और लक पर है। हां, कोशिश रहेगी कि इस बार हम खाली हाथ न लौटें। एथेंस ओलंपिक में भी अखिल और विजेन्दर हिस्सा ले चुके हैं। अखिल के पिता की तरह है विजेन्दर के पिता भी सरकारी नौकरी मंे हैं। वे हरियाणा रोडवज मंे ड्राइवर हैं लकिन इन्होंने अपने बेटे को ऐसे खेल में डाला जिससे उसे न केवल रोजगार मिल सके बल्कि वह देश का नाम भी रोशन कर सके। ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर चुके एक अन्य मुक्केबाज हैं दिनेश कुमार (81 किलो)। दिनेश के पिता हरियाणा रोडवज मंे कंडक्टर हैं। इसी तरह जितेन्दर (51 किलो) भी गरीब परिवार के हैं। भिवानी के साई सेंटर से ओलंपिक तक का सफर पूरा कर चुके हैं जितेन्दर। जितेन्दर कॉमनवल्थ गेम्स और एशियन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत चुके हैं। अखिल को ही अपना प्रेरणास्रेत मानने वाले जितेन्दर देश के उभरते मुक्केबाज हैं। अपने ग्रुप में वे देश के बेस्ट बॉक्सरों मंे शामिल हैं। इनके पिता के पास चार-पांच एकड़ का खेत है। इसी की खेती से इनका परिवार चलता है। भिवानी साई संेटर के कोच जगदीश बताते हैं कि ये चारों बच्चे अखिल, विजेन्दर, जितेन्दर और दिनेश मेरे पास 13-14 साल की उम्र मंे आए थे। सब-जूनियर से लेकर जूनियर और फिर सीनियर तक का सफर तय करत हुए ये ओलंपिक तक पहुंच गए हैं। अब इंतजार है तो ओलंपिक मैडल का। हां, मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि मुक्कबाजी का पहला ओलंपिक पदक भिवानी के नाम ही रहेगा। कब, इसका इंतजार है और संभवत: यह इंतजार बीजिंग ओलंपिक में खत्म हो जाएगा। कहने का मतलब साफ है भिवानी मुक्कबाजी की सप्लाई लाइन है। यहां लोग मुक्कबाजी को करियर के रूप में ले रह हैं।

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  • Web Title: भिवानी से बीजिंग तक