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नियोजन मामले में जिला स्थानीयता का आधार हो

उन्होंने मुख्यमंत्री के सचिव, मुख्य सचिव के सचिव, कपरूरी ठाकुर नेता विरोधी दल, विधानसभा और सभी विभागों के प्रधान, सार्वजनिक और निजी प्रतिष्ठान के प्रबंधकों को स्थानीय व्यक्ितयों की परिभाषा के बाबत पत्र लिखा था। पत्र में मुखत्यार सिंह ने लिखा था कि 28 अप्रैल 1ो मुख्यमंत्री जी की अध्यक्षता में स्थानीय व्यक्ितयों की परिभाषा निर्धारित करने के संबंध में एक बैठक बुलायी गयी थी। उक्त बैठक में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि तथा मान्यता प्राप्त विभिन्न श्रम संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि नियोजन के मामले में स्थानीय व्यक्ितयों की परिभाषा का आधार जिला को ही माना जायेगा। जिला में पिछले सव्रे के रिकार्ड ऑफ राइट्स में जिन लोगों की अपने या अपने पूर्वजों के नाम की जमीन बासगीत आदि का उल्लेख हो, उन्हें ही जिला के दायर में ‘स्थानीय’ माना जाना चाहिए। अत: आपसे अनुरोध है कि सरकार के इस निर्णय के आलोक में स्थानीय व्यक्ितयों को नियोजन के मामले में प्राथमिकता दें।ड्ढr बिहार सरकार के श्रम एवं नियोजन विभाग द्वारा जारी इस पत्र को राजग सरकार ने तब इस कदर दबाया और ऐसा विवाद खड़ा किया गया, जिसकी परिणति खून-खराबे के रूप में हुई। 2002 के 24 जुलाई की हिंसा में तब पांच लोग मार गये और झारखंड का सामाजिक-सांस्कृतिक तानबाना इस कदर बिखरा कि गांव-गांव घर-घर में फैले मनमुटाव और खड़ी की गयी दीवार को आज तक पाटा नहीं जा सका है। राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि झारखंड राज्य की कमान एक ऐसी सरकार के हाथों में रही, जिसके कप्तान (पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी) ने कभी अलग झारखंड राज्य के लिए संघर्ष नहीं किया। अलग झारखंड राज्य के बुनियादी कारणों से उनका कभी सरोकार नहीं रहा। यही वजह है कि उन्होंने स्थानीयता के सवाल पर ऐसा बखेड़ा खड़ा कराया, जिससे बाहरी खासकर शोषणकारी ताकतों को बढ़ावा मिला। बाहरी-भीतरी के भेद के सवाल ने सबसे ज्यादा नुकसान मूलवासियों का किया। अलग राज्य गठन के साथ ही जिन मसलों को एजेंडा बनाना चाहिए, उन्हें आज तक हाशिये पर रखा गया।ड्ढr जंगल पर आश्रित 70 प्रतिशत से अधिक लोगों के लिए एक वन नीति अब तक नहीं बनायी जा सकी है। बिहार सरकार के प्रस्ताव में कहा गया है कि वन पर से ग्रामीणों की निर्भरता उत्तरोत्तर कम होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव को बिना झारखंड के बौद्धिक आंदोलनकारियों से बात किये अंगीकृत किया गया।ड्ढr डॉ रामदयाल मुंडा के नेतृत्व में चल रहे और संजय बसु मल्लिक की छत्रछाया वाले ‘जंगल बचाओ आंदोलन’ ने विश्व बैंक और झारखंड के वन विभाग के साथ हुई बैठक में तीखा प्रतिवाद किया है। इसमें सुधार का आश्वासन मिलने के बाद भी इसे यथावत रहने दिया गया। स्थानीयता के मसले पर बिहार सरकार के संयुक्त सचिव मुखत्यार सिंह के पत्र को जिस राजनीतिक मंशा से दबाया गया हो और जिस अधिकारी ने दबाया हो, उन्हें चिह्न्ति कर सजा मिलनी चाहिए।ड्ढr सन् 2002 में हंगामा के दौरान मांडू से (7तक) विधायक रहीं रमणिका गुप्ता ने कई बार स्थानीयता की परिभाषा, जो बिहार सरकार ने तय की है, उसे उजागर करने का अनुरोध किया था, परंतु ऐसा नहीं किया गया। स्थानीयता की परिभाषा तय करने के सवाल पर कोयलांचल में लगभग 2000 मजदूरों को लेकर वे जेल भी गयी थीं। तब जाकर बिहार की तत्कालीन सरकार ने कमेटी बना कर स्थानीयता की परिभाषा तय की थी।ड्ढr झारखंड की प्रथम सरकार ने अनेक राजनीतिक भूल की है। कोइलकारो परियोजना विरोधी आंदोलन को कुचलने के लिए 2001 में दो फरवरी को पुलिस फायरिंग में आठ लोग मार गये। उसके पूर्व ईद के दिन 28 दिसंबर 2000 को पांच मुसलिम मार गये। अनेक दलितों की हत्या हुई। अनेक एमओयू हुए। सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को संशोधित करने की बात आयी। स्थानीयता के प्रश्न को डोमिसाइल के साथ घालमेल कर जो झमेला खड़ा किया गया, वह तो ऐतिहासिक ही है।ड्ढr अब तो सरकार को यह करना चाहिए कि स्थानीयता का आधार 1ा खतियान याने जिले का आखिरी सव्रे रिकार्ड ऑफ राइट्स हो, अन्यथा फिर अशांति को रोका नहीं जा सकेगा। (समाप्त)

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