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एक कदम और

भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊरा एजेंसी (आईएईए) की सर्वसम्मत मंजूरी से एक बड़ी बाधा तो पार हो गई। भारत की कोशिश थी कि आईएईए में मतदान न हो और सर्वसम्मत निर्णय हो क्योंकि आईएईए में मतभेदों से अगले चरण यानी नाभिकीय आपूर्ति समूह (एनएसजी) से मंजूरी में दिक्कत आती। आईएईए से मंजूरी यूं भी अपेक्षाकृत आसान थी, असली मुश्किल एनएसजी में आती है क्योंकि आईएईए की तरह एनएसजी में मतदान का प्रावधान ही नहीं है, वहां सार फैसले सर्वसम्मति से होते हैं। आईएईए में कई देशों ने अपना मतभेद तो दर्ज कराया, लेकिन वे सर्वसम्मत फैसले के खिलाफ नहीं गए। एनएसजी में कुछ देशों का ज्यादा कड़ा विरोध हो सकता है और भारत और अमेरिका को सर्वसम्मत फैसले के लिए काफी कूटनीतिक कवायद करनी पड़ेगी। इस तरह इस मुद्दे पर भारत सरकार ने तीन कठिन मुकाम तो पार कर लिए। पहला मुकाम अमेरिका के साथ समझौते के प्रारूप को अपने अनुकूल बनाना था। दूसरा मुकाम देश के अंदर विरोध का मुकाबला करना था और तीसरा आईएईए से मंजूरी पाना। उम्मीद यह करनी चाहिए कि अगले मुकामों पर भी भारत सरकार को सफलता हाथ लगेगी, क्योंकि यह समझौता तकनीकी उतना नहीं है, जितना भारत की नए वैश्विक परिदृश्य में स्थिति को लेकर है। तरह-तरह की एकाधिकारवादी और कट्टरतावादी ताकतों से जूझते विश्व में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और एक बड़ी आर्थिक शक्ित का राजनैतिक और सामरिक महत्व है। भारत को एक परमाणु शक्ित सम्पन्न, जिम्मेदार देश की तरह मान्यता मिलने से विश्व में शक्ित संतुलन में फर्क आएगा। शक्ित संतुलन में यह सकारात्मक बदलाव ही वह तर्क है, जिसके आधार पर इस समझौते के विरुद्ध देशों को एनएसजी में सहमत करवाया जा सकता है। अच्छी बात यह है, भावी राष्ट्रपति चुनाव के दोनों उम्मीदवार और अमेरिका की दोनों राजनैतिक पार्टियां इस समझौते को लेकर एकमत हैं और अमेरिकी संसद से इसे पारित कराने में ज्यादा मुश्किलें नहीं आएंगी। अभी एनएसजी की चुनौती सामने है, यह चुनौती अभी तक की यात्रा से कहीं ज्यादा है। लेकिन आईएईए में सफलता के बाद इस समझौते के पक्ष में माहौल बनता दिखाई देता है और उम्मीद है कि भारत और अमेरिका इस माहौल को और अपने पक्ष में करने में सफल होंगे।

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