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उम्मीद नहीं बंधाता कोलंबो शिखर सम्मेलन

दक्षिण-एशियाई सहयोग संगठन (सार्क) के सदस्यों का पन्द्रहवां शिखर सम्मेलन दो अगस्त से कोलम्बो में शुरू होने वाला है। अपने 22 वर्ष के जीवनकाल में सार्क ने शोध और प्रशिक्षण के अनेक क्षेत्रीय केन्द्र स्थापित किए हैं। आतंकवाद, बच्चों, स्त्रियों और नशीले पदार्थो के अवैध व्यापार को रोकने के लिए अनेक क्षेत्रीय करारनामों पर हस्ताक्षर किए हैं। पूर क्षेत्र में समारोहों और महासम्मेलनों का आयोजन किया है। इन सारी दिखावटी उपलब्धियों के बावजूद भी क्षेत्रीय सहयोगिता में कोई विशेष गतिशीलता नहीं आई है और न सार्क ने दक्षिण एशिया के आम लोगों की जीवन-दशा में सुधार लाने में कोई योगदान किया है। क्षेत्रीय शोध केन्द्रों की गतिविधियां साधन के अभाव में अवरुद्ध हो गई हैं। राजनैतिक इच्छाशक्ित के अभाव में स्वीकृत घोषणाओं, प्रस्तावों और समझौतों का कार्यान्वयन नहीं हो रहा है। समारोहों और आयोजनों के क्षणभंगुर प्रचार पर कोई असर नहीं हुआ है। इसलिए कोलम्बो शिखर सम्मेलन से कोई नई आशा नहीं जगी है। इसे मात्र एक और शिखर सम्मेलन के रूप में देखा जा रहा है। सार्क की गणना एक क्षेत्रीय आर्थिक समूह के रूप में होती है, जिसका मुख्य उद्देश्य है ‘आर्थिक एकीकरण’। दुर्भाग्यवश, आर्थिक एकीकरण की दिशा में सार्क की प्रगति नाममात्र के बराबर है। सच पूछें तो सदस्य राष्ट्रों में आर्थिक एकीकरण के उद्देश्य पर भी सहमति नहीं बन पाई है। सार्क के किसी भी सरकारी दस्तावेज में इस शब्द का जिक्र नहीं है। 1े शिखर सम्मेलन ने प्रतिष्ठित व्यक्ितयों की एक समिति का गठन किया था। 1में सौंपी अपनी रिपोर्ट में इस समिति ने सिफारिश की कि 2010 साल तक दक्षिण एशिया में एक मुक्त बाजार क्षेत्र स्थापित हो जाए, 2015 तक एक सामान्य सीमाशुल्क प्रणाली लागू हो जाए और 2020 तक इस इलाके को एक आर्थिक संघ में परिणत कर दिया जाए, पर इन उद्देश्यों के ऊपर अब तक राजनैतिक स्तर पर सहमति नहीं हो पाई है। इसके बावजूद कि आज सार विश्व में नई क्षेत्रीयता की एक लहर दौड़ रही है। दुनिया, खासकर एशिया की सभी गतिशील अर्थव्यवस्थाएं एक दूसर से जुड़ने के प्रयास में लगी हैं। आए दिन द्विपक्षीय मुक्त बाजार क्षेत्रों की स्थापना हो रही है। पुराने क्षेत्रीय मुक्त बाजार संगठनों में प्राण-संचार हो रहा है और अनेक नए मुक्त बाजार क्षेत्रों का निर्माण हो रहा है जसे उत्तरी अमेरिका मुक्त बाजार क्षेत्र (नाफ्ता), दक्षिण-पूर्वी एशियाई मुक्त बाजार क्षेत्र (आफ्ता) आदि। यह प्रक्रिया इतनी आगे बढ़ चुकी है कि आज विश्व व्यापार का दो-तिहाई भाग मुक्त बाजार क्षेत्रों में होता है, विश्व व्यापार संस्था (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के अनुसार नहीं। आज जो राष्ट्र किसी मुक्त बाजार क्षेत्र का सदस्य नहीं है, वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था से अलग-थलग रहेगा और विश्व बाजार में भेदभाव का शिकार होगा। क्षेत्रीय आर्थिक समूहों में आज दक्षिण एशिया ही इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में है। इस्लामाबाद शिखर सम्मेलन में दक्षिण एशियाई मुक्त बाजार समझौते (साफ्टा) पर हस्ताक्षर किया गया। यह समझौता जनवरी 2006 से लागू हो गया है। निस्संदेह आर्थिक एकीकरण की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रगति है, पर साफ्टा में अनेक खामियां हैं। यह विश्व का सबसे कमजोर और पंगुमुक्त बाजार समझौता है। इसके अंतर्गत सदस्य राष्ट्रों ने अपने पारस्परिक व्यापार का काफी बड़ा हिस्सा नकारात्मक सूची में यानी मुक्त बाजार के बाहर रख छोड़ा है। साफ्टा में एक समय-सीमा के अंदर इन नकारात्मक सूचियों को समाप्त करने का भी प्रावधान नहीं है। इसके अलावा गैर सीमा-शुल्क प्रतिबंधों को भी एक समय सीमा के अंदर शिनाख्त कर हटाने का भी प्रावधान नहीं है। हम जानते हैं कि आज व्यापार के प्रवाह में गैर राजस्व बाधाएं सीमा शुल्क से बड़ी बाधक हैं। साफ्टा में दक्षिण एशियाई देशों के बीच परिवहन एवं पारगमन की बाधाओं को हटाने की कोई व्यवस्था नहीं है। इन भौतिक प्रतिबंधों को हटाए बिना गैर सीमा शुल्क और सीमा शुल्क के प्रतिबंधों को हटाने का कोई तात्पर्य नहीं है। करीब-करीब सार मुक्त बाजार करारनामों में गहन एकीकरण के उपायों का प्रावधान होता है। इनमें शामिल हैं सेवाओं और पूंजी निवेश का उदारीकरण, वित्तीय और मौद्रिक सहयोग जिसके अंतर्गत एक सामान्य सिक्के के चलाने की भी व्यवस्था हो सकती है, आर्थिक नीतियों में संगति या सामंजस्य, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मुद्दों पर सामान्य नीति अपनाना, इत्यादि। साफ्टा में गहन एकीकरण के इन उपायों में से किसी का भी जिक्र नहीं है। सार्क के राष्ट्र आर्थिक एकीकरण लाने से और इसको ठुकराने से होने वाली अपार क्षतियों से पूर्णत: वाकिफ हैं। अगर इसके बावजूद भी वे इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं, तो इसका कारण है इतिहास का बोझ, आपस में कई साल से चलता आ रहा अविश्वास, वैमनस्य वगैरह। इसी कारण से पाकिस्तान ने भारत को एमएफएन की सुविधा न देकर सार्क के दो-तिहाई संभावित व्यापार को साफ्टा से बाहर निकाल दिया है। बांग्लादेश भारत को और पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान को पारगमन की सुविधाएं प्रदान नहीं कर रहा है। भारत भी दक्षिण एशिया के वृहत्तम राष्ट्र के रूप में अपना कर्तव्य निर्वाह नहीं कर रहा है। कोलम्बो शिखर सम्मेलन में आतंकवाद को रोकने के लिए एक दूसर को सहायता करने के एक समझौते पर हस्ताक्षर हो सकता है। पर क्या इसको अमल में लाया जाएगा। भारत, दिल्ली के पास दक्षिण-एशियाई विश्वविद्यालय की स्थापना में हुई प्रगति पर एक रिपोर्ट पेश करगा। इसका आर्थिक एकीकरण से कोई प्रत्यक्ष सरोकार नहीं है। इसके अलावा, जब भारत दशकों पहले स्थापित अपने ही विश्वविद्यालयों के सतत ह्रास को रोकने में समर्थ नहीं है, तो क्या गारंटी है कि यह नया क्षेत्रीय विश्वविद्यालय एक अग्रणी संस्था के रूप में उभर पाएगा। सार्क में भारत के प्रभाव को कम करने के लिए अन्य सदस्य राष्ट्र हाल ही में स्वीकृत चीन, अमेरिका, जापान आदि सार्क पर्यपेक्षक सदस्यों के सार्क में अधिक सक्रिय भाग लेने पर जोर डालने वाले हैं। मानो कि दक्षिण एशिया में आर्थिक एकीकरण के लिए हम इन्हीं पर्यवेक्षक सदस्यों का इंतजार कर रहे थे। क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के लिए सार्क देशों में हमें एक जनमुहिम चलानी होगी। इसके द्वारा एकीकरण के संदेश एवं फायदों को अवाम के बीच लाना होगा। झूठे राजनैतिक तर्को के आधार पर एकीकरण के खिलाफ जो साजिश चल रही है, उसका पर्दाफाश करना होगा। शायद एक और गणमान्य व्यक्ित समिति का गठन करना चाहिए जिसके सदस्य सरकार के नुमाइंदे न हों, बल्कि नागरिकों के प्रतिनिधि। इन प्रतिष्ठित व्यक्ितयों को कम से कम अगले चार-पांच साल तक सरकार का मार्गदर्शन करना चाहिए। लेखक भारत के विदेश सचिव रह चुके हैं।ं

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