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डर किस बात का, कर लो दुनिया मुट्ठी में

जब वर्ष 1में अपने यहां उदारीकरण का दौर शुरू हुआ, चारों ओर इसके विरोध में यही हल्ला सुनाई पड़ने लगा कि अब भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों के सामने टिक नहीं पायेंगी या बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निगल ली जायेंगी, लेकिन हुआ उलटा। भारतीय कंपनियों ने ही हर क्षेत्र में बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया। टाटा स्टील कभी कोरस कंपनी को ले लेगी, कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था। ‘टेटली’ को टाटा टी ने ले लिया। टाटा मोर्ट्स ने जगुआर और लैंडरोवर जैसे प्रतिष्ठित ब्रांडों पर कब्जा कर लिया। दवा कंपनियां हों या ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनियां, हर एक ने विदेशों में कंपनियों को लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखलायी। आदित्य बिड़ला ग्रुप की ग्रासिम हो या अनिल अग्रवाल की स्टरलाइट यानि वेदांत, रिलायंस का तो जवाब नहीं, ये सारी कंपनियां आज स्वयं बहुराष्ट्रीय कंपनियां बन गयी हैं। आज भारत फोर्ज दुनिया में दूसर नंबर पर है। सीडी बनाने वाली मोजर बायर कंपनी चौथे नंबर पर है। स्टील सम्राट मित्तल को तो अधिग्रहण किंग भी कहा जाता है। टाटा की नैनो कार ने उत्पादन के पहले ही विश्व में तहलका मचा दिया।ड्ढr उदारीकरण के बाद तो जैसे भारतीय कंपनियों में अपनी मशीनों और टेक्नोलॉजी को विश्व स्तर पर लाने की होड़ मच गयी। प्रचुर विदेशी मुद्रा भंडार की वजह से विदेश यात्राओं की खुली छूट मिली और आयात पर लगे अधिकांश प्रतिबंध हटा लिये गये। बस जैसे एक फाटक खुल गया हो, लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की बाढ़ सी आ गयी। लोगों ने विदेशी कंपनियों के साथ गठजोड़ किया। उनकी आधुनिकतम मशीनें मिलीं। विश्व बाजार में टिकने के लिए क्वालिटी में तत्काल सुधार लाना और उन्नत तकनीक एवं मैनेजमेंट से लागत में कमी लाना इनकी मजबूरी हो गयी और वे इन सबमें सफल भी हुईं। इस प्रकार भारतीय कंपनियों को चौतरफा फायदा हुआ। कोई भी टेक्नोलॉजी एक क्षेत्र में आती है, उसका लायदा अनेक क्षेत्र उठाते हैं। शुरू में मारुति के अधिकांश पुर्जे सुजुकी कंपनी जापान से भेजती थी, लेकिन उसके पुर्जे बनाने के लिए अनेक अनुषंगी इकाइयां भी सुजुकी टेक्नोलॉजी के साथ चालू हुईं। आज ये इकाइयां इतनी आगे चली गयी हैं कि उनसे विश्व के दूसर कार निर्माता भी अपने लिए पुर्जे खरीद रहे हैं।ड्ढr कल पढ़ें : कृष्ण और चाणक्य की भूमिका निभाये इंडिया

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