अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आतंकवाद का एक्शन थ्रिलर और हम

हम सचमुच साहसी लोग हैं। हम किसी भी आतंकी कार्रवाई से नहीं घबड़ाते। हम में गजब की शक्ित और सहनशीलता है। हम शायद उस समय तक सबकुछ बर्दाश्त करने को तैयार हैं जबतक कि आतंकवादियों को सुबुद्धि न मिल जाए और वे स्वयं शांति के मार्ग पर चलने को तैयार न हो जाएं। हर आतंकवादी घटना के उपरांत हम उस शत्रु से लड़ने की अपनी प्रतिबद्धता दुहराते हैं जो अपनी मर्जी से वार करता है और आंधी-तूफान की तरह अपना काम कर गायब हो जाता है और जिसे सिर्फ हम कभी आतंकवादी तो कभी नक्सली, अलगाववादी का नाम देकर संतुष्ट हो जाते हैं। हर आतंकवादी घटना के उपरांत राजनीति, प्रशासन, शैक्षणिक जगत और मीडिया के कुछ जाने-पहचाने चेहर तब तक इससे निबटने पर चर्चा करते हैं जब तक यह मुद्दा देश के मानस से गायब न हो जाए। झटपट टीवी चैनल पूरी त्रासदी का नाटय़रूपांतरण तैयार कर लेते हैं जिसे हम विज्ञापनों के कॉमिक अंतराल-कामर्शियल ब्रेक के बीच देखते रहते हैं। सनसनीखे मानसिकता हमारी संवेदनशीलता पर पूरी तरह छा गई है। क्या आतंकवाद के खतर को इस प्रकार की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता से समाप्त किया जा सकता है? हमारी राष्ट्रीय संवेदना को क्या हो गया है? विशेषकर जब वह राष्ट्रीय सुरक्षा जसी समस्या पर एक सहमति कायम करने से संबंधित हो। क्यों हम आतंकवाद के खिलाफ एक राष्ट्रीय योजना नहीं बना पाते? करीब पिछले दो दशकों से हम आतंकवाद, सांप्रदायिकता पर चर्चा करते आ रहे हैं। लेकिन हम किसी निष्कर्ष पर अब तक नहीं पहुंच सके। हर वो व्यक्ित जो इस विषय पर अपना कोई मत रखता हो हम उसकी ओर उम्मीद की नजर से देखते हैं। सहमति कायम करने के बजाय हम या तो अपनी शक्ित एक-दूसरे पर आक्षेप लगाने अथवा टीवी स्टूडियो में चर्चा करने में बिता देते हैं। हममें से कुछ इसका ठीकरा आतंकवाद के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर फोड़ते हैं तो कुछ इसे पुलिस और खुफियातंत्र की अक्षमता, आतंकवाद विरोधी कानून के अभाव, समाज के सांप्रदायिक विभाजन अथवा स्पष्ट राजनैतिक अवसरवादिता से जोड़ने में लग जाते हैं। शायद हमें सारी समस्याओं की जानकारी है, परंतु क्या हमार पास कोई समाधान भी है? जब कभी हम संसद के सदन अथवा किसी जनमंच पर इसकी चर्चा करते हैं तो वह मंच चर्चा करने वालों की व्यक्ितगत रणभूमि में तब्दील हो जाता है और वे लोग अपनी व्यक्ितगत अथवा पार्टी की विचारधाराओं के प्रति ज्यादा और इस खतरनाक समस्या के प्रति कम प्रतिबद्ध दिखते हैं। आतंकवाद पर होने वाली चर्चा के दौरान हम पूर देश को इस बेकार की बहस में उलझा कर रख देते हैं कि इस देश में पोटा जसा कोई कानून होना चाहिए या नहीं या फिर पोटा का विरोध अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा है या नहीं? हमार कटु अंतर्विरोध उन लाखों बगावतों (मिलियन्स म्यूटिनीज) की तरफ इशारा करते हैं जिन्होंने भारत को अंदर से खोखला कर दिया है। शायद हम अब तक राजनैतिक कारणों से आतंकवाद को धर्म के महान उद्देश्य से अलग करने को पूरी तरह तैयार नहीं हैं और न ही ऐसी कोई व्यवस्था करने में सक्षम हैं जिससे आतंकवाद के बढ़ते साए को रोका जा सके। इस बात पर विवाद खड़ा करना कि आतंक के खिलाफ कार्रवाई एक धर्म विशेष के खिलाफ कार्रवाई करने के समान है वास्तव में उसकी और उसके मानने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की छवि बिगाड़ने का एक सचेत प्रयास है। धर्म तो आतंक फैलाने की क्षाजत कभी नहीं देता और यदि ऐसा है तो वह धर्म नहीं एक खतरनाक संप्रदाय मात्र है। सच को नकारने की हमारी अक्षमता ने हमार समाज की स्थिरता और एक महान धर्म की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया है। अहमदाबाद में हाल ही में हुए बम धमाकों को पहले हुए सांप्रदायिक दंगों के प्रतिशोध के रूप में देखे जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। साथ ही इसे भारत और यहां की पिछली और वर्तमान सरकारों की अमेरिका से बढ़ती नजदीकी से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। लेकिन यहां यह समझने की बड़ी जरूरत है कि आतंकवादी किसी सरकार विशेष के खिलाफ काम नहीं कर रहे। उनका निशाना तो यह देश और यहां का सामाजिक सौहार्द है न कि यहां की सरकारं। अपनी कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए आतंकी कोई भी बहाना ढूंढ सकते हैं। खुशकिस्मती से जब अहमदाबाद में हुई हाल की आतंकी कार्रवाई के बाद राजनेता, मीडिया और बुद्धिाीवी इस पर बहस करने में व्यस्त थे, तब इस शहर और लखनऊ के मुस्लिम समुदाय के लोग ज्यादा सच्चाई और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए सड़कों पर उतर कर शांतिपूर्ण ढंग से अपना विरोध प्रकट कर रहे थे। उन्होंने आतंकवाद को समुदाय से अलग कर देखने का आग्रह करते हुए कड़े शब्दों में सार्वजनिक रूप से इस घृणित कार्य की भर्त्सना की। उनकी इस पहल को जितनी चाहिए थी उतनी जगह मीडिया के रिपोर्टों में तो नहीं मिली परंतु उनका यह सराहनीय कदम लोगों की नजरों से छिपा भी न रह सका। आतंकवाद के खिलाफ दारूल उलूम देवबंद का फतवा मुस्लिम उलेमाओं द्वारा इस्लाम को आतंकवाद से अलग रूप में देखे जाने के लिए उठाया गया एक सराहनीय कदम था। अहमदाबाद और लखनऊ में मुस्लिम समुदाय द्वारा इसकी सार्वजनिक मुखालफत दूसरा बहादुरी से भरा दूरदर्शी कदम था। संकीर्ण राजनैतिक लाभ और विचारधारा ने भारत में धर्म और आतंक के संबंध को मजबूती प्रदान की है। पश्चिम की दुनिया आतंकवाद को दो सभ्यताओं के संघर्ष (क्लैश ऑफ सिवलिजेशन) के रूप में देख कर उस पर विश्वास कर सकती है। परंतु हमारे लिए ऐसा कर पाना संभव नहीं क्योंकि हम एक ही सभ्यता की उपज हैं जिसकी एक साझा सांस्कृतिक विरासत भी है। एक छोटी शुरुआत के रूप में ही सही लेकिन लोग अब यह मानने लगे हैं कि आतंक कोई धार्मिक कृत्य नहीं है। यह मानवता के खिलाफ किया गया अपराध है जिसे कि कानून-व्यवस्था के दायर में देखा जाना चाहिए और इससे निबटने के लिए देश के आपराधिक न्यायव्यवस्था (क्रिमिनल जस्टिस) को अधिक मजबूत बनाया जाना चाहिए। शायद यह सोच हमार देश के राजनैतिक और वैचारिक एजेंडे को जल्द ही प्रभावित करगी और उसके द्वारा अपने को अभिव्यक्त कर पाएगी। यह तभी संभव हो पाएगा जब हम किसी प्रकार की आतंकवादी अथवा अस्थिरता प्रदान करने वाली कार्रवाई को महा एक ऐक्शन थ्रिलर के रूप में देखना बंद कर देंगे चाहे वह धर्म के नाम पर हो या फिर अलगाववाद या नक्सलवाद के नाम पर। लेखक राष्ट्रीय डिााइन संस्थान, अहमदाबाद में अध्यापन करते हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: आतंकवाद का एक्शन थ्रिलर और हम