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‘25वें हफ्ते में गर्भपात की इजाजत नहीं’

मुंबई उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक दंपति की याचिका खारिज कर दी जिसमें उन्होंने अपने 25 सप्ताह के अजन्मे शिशु का गर्भपात कराने की अनुमति मांगी थी। दंपति ने न्यायालय से गुजारिश की थी कि गर्भ में पल रहे शिशु को हृदय की बीमारी है इसलिए उन्हें गर्भपात की अनुमति दी जाए। यह बहुप्रतीक्षित फैसला न्यायाधीश पीबी मजुमदार और न्यायाधीश एए सैय्यद की खंडपीठ ने हरेश और निकिता मेहता की अपील पर सुनाया। इससे पहले सरकारी जेजे अस्पताल ने न्यायालय में इस विषय पर अपनी दूसरी चिकित्सकीय रिपोर्ट दाखिल की कि क्या मेहता दंपति भ्रूण को नष्ट कर सकते हैं अथवा नहीं। पिछले शुक्रवार को दूसरी चिकित्सकीय रिपोर्ट का आदेश देते हुए न्यायलय ने चिकित्सकों की टीम को आदेश दिया था कि वे इस विषय पर स्पष्ट राय दें जिससे न्यायालय को निर्णय लेने में आसानी हो। पहली रिपोर्ट में चिकित्सकों ने कहा था कि बच्चे के जन्म के बाद असामान्य होने की ज्यादा संभावना है। इसके बाद ही न्यायलय ने दूसरी रिपोर्ट तलब की थी। दूसरी रिपोर्ट में चिकित्सकों ने कहा कि बच्चे के असामान्य होने की काफी कम संभावना है। याचिकाकर्ताओं ने ‘मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1’ की धारा 3 और 5 को चुनौती दी थी। धारा 3 के मुताबिक कोई स्त्री भ्रूण के खराब होने पर गर्भपात करा सकती है लेकिन 20 सप्ताह के भीतर। धारा 5 के मुताबिक कोई स्त्री तब भी गर्भपात करा सकती है जब भ्रूण के कारण उसकी जान को खतरा हो। इस धारा में गर्भपात की अवधि का जिक्र नहीं किया गया है। उल्लेखनिय है कि मेहता दंपति ने अपनी याचिका में कहा था कि बच्चे के हृदय में खराबी के कारण उसे हमेशा पेसमेकर पर रखना होगा इसलिए उन्हें इसे नष्ट करने की अनुमति दी जाए।

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  • Web Title: ‘25वें हफ्ते में गर्भपात की इजाजत नहीं’