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रोना एक शानदार कला

चालीस वर्ष तक मेरे परममित्र रहे गजानन बाबू यानी शैल चतरुवेदी! गत वर्ष चल बसे! शैल जी में एक अदभुत कला थी.. रो पड़ने की। इतने संवेदनशील थे कि बात-बात पर सुबक कर रो पड़ते थे! कवि सम्मेलन में, शैल मेरे साथ ठहरे थे राजकोट में! होटल की व्यवस्था माकूल नहीं थी! मैंने मैनेजर को बुला कर कहा कि झटपट चादर बदलवा दो, वरना शैल जी रो पड़ेंगे! और शैलजी रो पड़े.. जानें क्यों! कुछ लोगों के लैकरायमल ग्लिंडस बहुत तीव्र होती है! रोते देखकर आजू-बाजू वाले कयास लगाने लगता है कि शायद अगले का बाप ताजा-ताजा मरा है! रोना भी एक फाइन आर्ट है। पढ़ा कि संसद में शक्ित परीक्षण के समय एक सांसद फफक कर रो पड़े! क्या दु:ख था? सरकार गिरने का (गिरी नहीं), दुख था या शायद दूसरों की खरीद-फरोख्त का माल देखकर नैन जल भर आया हो! खबर पढ़कर मुझे झुंझलाहट हुई। रुलाई पब्लिक के चेहर पर नेचुरल लगती है। नेता को रोते देख कर कोफ्त होती है। रोना ही था तो राजनीति में क्यों आए? परीक्षण के दौरान हड़कंप मचा.. चीख, पुकार हुई .. नोटों की गड्डियां लहराईं ..पर रोया कोई नहीं! शायर ने भी कहा- ‘यों ही अगर आंखों में आंसू.. जाईये, कोई बात नहीं!’ .. पूर देश की आंख में आंसू ठीक लगते हैं- नेता रोता है तो लगता है कि या तो उसे बरसाती ‘वाइरल कांक्टाईविस’ हो पड़ी है.. या सरकार गिरने का अंदेशा! दूसरों को ब्रीफकेस भरते देखकर हूक उठ गई होगी या फिर खुदा.. उसकी जगह हम न हुए! किसी बड़े शहर में बिल्डिंग खड़ी होती! रोने का मेरा भी मन हुआ राजनीतिक गटर देखकर। जहां कभी अठन्नी न उछली वहां गड्डियां फरफरा उठीं। साव के नजारे हैं, भय्ये! शायर बोला - ‘हंसता हूं आस-पास के आंसू समेटकर.. क्या खाक हंसेंगे जिन्हें रोना नहीं आता!’ छठे छमाहे रो लेना भी मुफीद है। पं. नेहरू भी सिर्फ एक बार रोये थे .. दामाद फिरो गांधी के निधन पर! आंसुओं के मामले में हमारा देश आत्मनिर्भर है। आंसू आयात नहीं करने पड़ते! खूब रोओ- रुलाओ! मुझे हंसी आती है! डील के टाइम पर डील करनी चाहिए- रोना बेमानी है। तेल लगे चिकने हाथों से नहीं पकड़ा जाता। रो पीट कर चुप! तलवार कितनी भी तेज हो.. अपनी म्यान कभी नहीं काटती! .. हम भ्रष्टन के .. भ्रष्ट हमार! कैरी आन! बच्चा रोता है मां दूध थमा देती है। नेता रोता है तो डिप्टी मिनिस्ट्रिी का हकदार हो जाता है। लो जी, रोना फलदायक हुआ! फिल्म वालों को रोने की सहूलियत है। आंखों में एक बूंद गिलीसरीन डाल ली! आंसू बह चले.. सीन उम्दा शूट हुआ। संसद में रोना नुकसानदेह है। आंसू तो गरीब जनता का खजाना है। आप के पास मिटाने को पूरा देश है.. आंसू तो छोड़ दो पब्लिक के फफक उठने को! आंसू बैंक के लाकरों में नहीं रखे जाते!

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  • Web Title: रोना एक शानदार कला