DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पक्की वर्दी

महिलाओं को महा ‘आंचल में दूध और आंखों में पानी’ से जोड़कर देखने की मानसिकता तेजी से बासी पड़ रही है। आज वे हर पेशे में जिम्मेदार पदों पर हैं और कल सेना में बतौर स्थायी अफसर भी दिखाई पड़ेंगी। लम्बी जद्दोहद के बाद नब्बे के दशक से सेना के तीनों अंगों में महिला अधिकारियों की भर्ती शुरू की गई, लेकिन यह नौकरी कच्ची थी। कमीशन प्राप्त महिला अधिकारियों का कार्यकाल पांच से 14 बरस तक ही होता है। पुरुषों की तरह उन्हें स्थायी कमीशन देने की मांग लम्बे समय से की जा रही थी। इस विषय में सरकार ने शीघ्र सकारात्मक फैसला करने का जो आश्वासन संसद को दिया था, उस पर अमल का वक्त निकट है। फिलहाल तय किया गया है कि पक्की नौकरी पाने वाली महिला अफसरों को लड़ाकू दस्तों से दूर रखा जाए। उन्हें शिक्षा, कानून, गुप्तचर, सिगनल, आर्डिनेंस या इांीनियर्स विभाग में ही नियुक्त किया जाएगा। थल सेना में पैदल, तोपखाने व टैंक बटालियनों, वायु सेना में लड़ाकू विमानों तथा नौसेना में जंगी पोतों पर उनकी नियुक्ित नहीं होगी। वैसे तो महिलाओं को लड़ाकू दस्तों से दूर रखने का निर्णय अनुचित है, क्योंकि दुनिया के अनेक देशों की सेनाओं में वे यह काम बखूबी कर रही हैं। भारतीय सेना को भी अंतत: इस गैर बराबरी के सिद्धांत को छोड़ना पड़ेगा। यूं भी आधुनिक युद्धों में मानव से ज्यादा महत्व मशीन और तकनीक का होता है। रणनीति गढ़ने और उस पर अमल के मामले में महिलाओं को किस आधार पर उन्नीस समझा जा सकता है? सेना की भर्ती में किसी प्रकार का आरक्षण लागू नहीं होता, इसलिए जो लड़कियां कमीशन पाएंगी वे केवल अपनी योग्यता के आधार पर ही मुकाम बनाएंगी। प्रशिक्षण और तरक्की में भी उन्हें कोई रियायत नहीं दी जाएगी। सेना में भर्ती का सिलसिला फिलहाल अधिकारी स्तर पर ही लागू है। जवानों और एनसीओ स्तर पर भी इसे लागू किया जाना चाहिए। जब पुलिस में महिला सिपाहियों की भर्ती हो सकती है तब सेना में ऐसा करने में क्या कठिनाई है?

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: पक्की वर्दी