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पर्यावरण की पृष्ठभूमि में पेड़

पर्यावरण में अगर किसी तरह का प्रदूषण होता है तो उसका असर मनुष्य के फेफड़ों, हृदय और मस्तिष्क के साथ-साथ ब्रह्मास्त्र की तरह पृथ्वी के गर्भ तक क्षति पहुंचाता है। हमें पर्यावरण की याद भिन्न-भिन्न ऋतुओं और मौसमों में अलग-अलग तरह से आती है। गर्मियों में ग्लोबल वार्मिग, पेयजल संकट छाया रहता है। बरसात में बाढ़, भूस्खलन और जल प्रदूषण का उफान रहता है। जाड़ों में हिमयुग की वापसी और वाहनों द्वारा फेंके गए कार्बन के पृथ्वी की ओर लौट आने के भयावह आंकड़े परोसे जाते हैं। कौरवों की सभा में द्रौपदी की तरह ओजोन परत बारहों महीने खतर में पड़ी रहती है। पर्यावरणविदों ने बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पर्यावरण प्रदूषण और असंतुलन की ओर पूरी विश्व मानवता का ध्यान तरह-तरह से आकृष्ट किया। उससे एक चेतना पैदा हुई और पर्यावरण का व्यावसायिक बाजार भी पैदा हुआ। उसी का परिणाम है कि एनजीओ चलाने वाले पर्यावरणवादियों की अच्छी-खासी अप्रशिक्षित व्यावसायिक फौा भारत में भी खड़ी हो गई है। एक बाजार पर्यावरण प्रदूषण द्वारा असंतुलन पैदा करने वालों का है तो दूसरा समानांतर बाजार प्रदूषण निवारण संयंत्रों का स्थापित हो चुका है। प्रकृति की ओर से मुफ्त मिलने वाले पानी का बाजार दूध के बाजार से बड़ा और महंगा हो गया। पर्यावरणविदों ने पर्यावरण और प्रगति में संतुलन और समन्वय का जो विचार दिया था, पर्यावरणवादियों ने उस वैज्ञानिक चिंतन की परम्परा को रूढ़ियों में बदल दिया है। अच्छे पर्यावरणविद धर्म की आड़ नहीं लेते, वे मनुष्य के अस्तित्व और स्वास्थ्य की स्थितियों को सामने रखते हैं। वे निर प्रकृतिवादी न होकर मनुष्य के पक्ष में संयमित वैज्ञानिक दोहन के पक्षधर होते हें। क्योंकि अच्छे दर्शन का अंतिम लक्ष्य सुरक्षित और बेहतर मनुष्य है। वे प्रकृति को भी मनुष्य की नुकसान विहीन प्रगति का हिस्सा बनाना चाहते हैं। लेकिन बाजार शैली में एनजीओ चलाने वाले पर्यावरणवादी सुधार की बात कर्मकांडी पुरोहितों की रूढ़ शैली में करने लग जाते हैं। पेड़ लगाने के दृष्टिकोण और अभियान में भी सुधार की जरूरत है। वृक्षों का चयन भौगोलिक आवश्यकता के अनुसार नहीं किया जाता है। कोई पेड़ लगा या ठोक देना पर्यावरण सुधार होता जा रहा है। होना यह चाहिए कि भौगोलिक परिस्थितियों में अधिकतम उपयुक्त वृक्षों को सोची-समझी रणनीति के तहत रोपित किया जाए। कुछ वृक्ष ऐसे हैं जो अधिकतम जल संग्रह की शक्ित रखते हैं। उनका अधिकतम रोपण सूखते जा रहे जलागम क्षेत्रों में किया जाना चाहिए। चौड़ी पत्तियों वाले वृक्षों का रोपण ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतम किया जाना चाहिए क्योंकि वे पशु चारा और जल संरक्षण के अद्भुत स्रेत हैं। कई झाड़ियां और वृक्ष विषैले और हानिकारक हैं। उनमें से जिनमें औषधीय गुण हैं, उन्हें सार्वजनिक स्थलों से दूर सुरक्षित क्षेत्रों में उगाया जाना श्रेयस्कर होगा। कुछ ऐसे भी वृक्ष हैं जो सर्वगुण सम्पन्न हैं। अधिकतम प्राणवायु, अधिकतम जल संग्रहण और भूक्षरण रोकने में बेदल कामयाब। लेकिन दुर्भाग्य कि पेड़ों को हम उनके गुण और नाम से नहीं पहचानते। हर एक को ‘पेड़’ कहकर ही काम चला लेते हैं। जबकि गृह उपयोगी और आर्थिक वृक्षों की पहचान अलग-अलग कराई जानी चाहिए। दक्षिण का भोजन और कश्मीर का ‘फिरन’ पूर देश के खाने-पहनने में शामिल हो गए हैं। लेकिन नारियल-सुपारी और चिनार के पेड़ को हम कुमाऊं-गढ़वाल में अपने साथ नहीं ला सके। जहां-ाहां काफल होता है वहां-वहां सुपारी का वृक्ष भी उग सकता है और जहां-ाहां ताड़ और खजूर होते हैं वहां-वहां नारियल भी उगाए जा सकते हैं। जहां-ाहां साल और टीक (सागौन) होते हैं वहां-वहां चिनार भी हो सकता है। हमें प्रयास और प्रयोग बंद नहीं करने चाहिए। ऋषिकेश के निकट नरन्द्र नगर के आस-पास बांज के वन हैं लेकिन उत्तरकाशी के सिरहाने समस्याग्रस्त वरुणावत पर अब एक भी बांज, बुंरास, मौरू और आंवले का पेड़ नहीं है। बांज के पुनर्वास का वन विभाग ने प्रयास ही नहीं किया अन्यथा पर्वत-स्खलन की आधी बीमारी तो प्राकृतिक निदान से ही दूर हो जाती। फिलहाल वरुणावत पर बेगन-बेलिया की विविध रंगी झाड़ियां लगा दी जाएं तो वह पहाड़ गुलदस्ते जसा नयनाभिराम और पर्यटन की दृष्टि से भी आकर्षक हो जाएगा। यह अत्यंत दुख की बात है कि पहाड़ों से ‘पैयां’ का पेड़ गायब होता जा रहा है। ‘पैयां’ का पेड़ भोजपत्र और पद्म की मिली-ाुली संतान है। पैयां की छाल से डार्क कत्थई रंग का भोजपत्र निकलता है। पैयां की लकड़ियां और उसके पत्ते धार्मिक अनुष्ठानों में काम आते हैं। एक गीत में कहा गया है कि - हमार खेत की मेंड पर नई डाली पैयां जमी है, आओ उसकी पूजा करं। भोजपत्र के और पद्म के वृक्ष हर जगह नहीं हो सकते लेकिन पैया के वृक्ष हर जगह हो जाते हैं। वृक्षों में ‘पयां’ ही पद्म श्री है। शत-प्रतिशत ऑक्िसजन के साथ पैयां अच्छा चारा देते हुए भूस्खलन से भी बचाता है। नई टिहरी की एक सड़क पर किसी अधिकारी ने पैयां का रोपण कराया है। वह सड॥क सबसे अनोखी दिखती है। ऐसे अधिकारियों को सम्मानित किया जाना चाहिए। लेकिन पर्यावरणवादी पुरोहित को स्वयं का सम्मान कराने से ही फुर्सत नहीं है। पूर्ण आयु प्राप्त वृक्षों को सूख कर मरने से कुछ पहले काटने के लिए चुनने की भी एक वैज्ञानिक पद्धाति विकसित की जानी चाहिए वरना बेशकीमती पेड़ केवल ईंधन बनकर रह जाएंगे। लेकिन पर्यावरण के रूढ़िवादी पुजारियों का दृष्टिकोण विकास के लिए पूर्णायु प्राप्त वृक्षों के उपयोग में भी बाधक है। जहां वृक्ष काटने अपरिहार्य हों वहां एक के बदले दस वृक्ष लगाने की कानूनन बाध्यता हो। अगर सड़क, अस्पताल, स्कूल इत्यादि जन विकास की योजनाओं में भूतपूर्व पेड़ आड़े आ रहे हों तो उनके एवज में उसी इलाके में पुनरुत्पादन, पुनरेपण द्वारा क्षतिपूर्ति की बाकायदा संवैधानिक व्यवस्था हो। चिह्न्ति गुण-धर्म वाला सुचिंतित वृक्षारोपण अनिवार्य हो। वृक्षारोपण में सेवानिवृत्त और बेरोगार सभी तरह के लोगों को पारिश्रमिक देकर जोड़ा जाए। तभी रुंड-मुंड पहाड़ों को नया जीवन मिल पाएगा। नदियों के जलस्तर और हवाओं के प्राण-पोषक तत्वों की वृद्धि होगी। जो है, उसके संरक्षण तक ही पर्यावरण चेतना आंदोलन को सीमित नहीं रखना चाहिए। जमीन को जल-ांगल के पुनर्जन्म की शक्ित वापस करनी है। इसके लिए संरक्षणवादियों को सृजनशील भी बनना पड़ेगा। जो है- उसकी समाप्ति एक दिन स्वत: होनी है। हर संग्रहण का एक अंत है। जल, जंगल और मीन के नव सृजन से संसाधनों के नए स्रेत निकलेंगे। गंदले आसमान को केवल संरक्षणवाद से ही नहीं झाड़ा जा सकता बल्कि उसे नवसृजनवादी चेतना से ही बुहारा जा सकता है। अगर सभ्यता का आवासीय क्षेत्र आसमान की ओर बढ़ रहा है तो आनुपातिक रूप से उतनी जमीन खाली और खुली होनी चाहिए। चूंकि बसावट ऊंचाई की ओर जा रही है तो आसपास उतनी चौड़ाई में वृक्षारोपण आवश्यक है। पर्यावरण चेतना में ‘स्पेस’ का महत्व समझने की आज सबसे ज्यादा आवश्यकता है।ड्ढr लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं

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