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इतिहास : बदलाव के कुछ नाजुक क्षण

लेकिन इस बार उन्होंने लोगों को अपनी निर्णायक लड़ाई के हथियार खुद चुनने की आजादी दे दी थी- ‘आज इस क्षण से आप में से हर एक आदमी और औरत को खुद को आजाद समझना चाहिए और इस तरह काम करना चाहिए जसे आप साम्राज्यवाद के पांवों तले कुचले जाने से मुक्त हो चुके हैं। यहां मैं आपको एक छोटा-सा मंत्र देता हूं- करंगे या मरंगे। हम या तो भारत को आजाद कराएंगे या फिर इस कोशिश में मार जाएंगे।’ अगले दिन पौ फटते ही गांधी जी को गिरफ्तार किया जा चुका था। लेकिन कुछ ही घंटों में टेलीसन के ये शब्द- करंगे या मरंगे- करोड़ों-करोड़ गुलाम भारतीयों की जुबान पर थे। लोग अपने देश की आजादी के लिए लड़ मरने पर उतारू हो गए। रल पटरियां उखाड़ दी गईं, टेलीफोन तार काट दिए गए, थानों-कचहरियों और अंग्रेजी सरकार के हर अंग पर हमले किए जाने लगे। समूचा बंदोबस्त छिन्न-भिन्न हो गया। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, बंबई, कर्नाटक और उड़ीसा के तमाम क्षेत्रों से अंग्रेजी राज का सफाया-सा कर दिया गया। इस भीषण आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजी सरकार ने अपनी सब ताकत झोंक दी। 1857 की यादें ताजा हो गईं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पहले चार दिनों में ही 600 और नवम्बर के अंत तक 1000 लोग पुलिस की गोलियों और लाठियों से शहीद हो चुके थे। वास्तविक आंकड़े 10,000 से कतई कम नहीं थे। कांग्रेस को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया और सभी बड़े नेता जेल में डाल दिए गए। गांधी जी बखूबी जानते थे कि आंदोलन को नियंत्रित और अनुशासित रख पाना असंभव होगा। हालांकि वे तब भी चाहते थे कि आंदोलनकारी अहिंसक रास्ते पर ही चलें। लेकिन उन्हें पता था कि इस बार ऐसा नहीं होने जा रहा। उन्होंने कहा भी था- ‘लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं 10 वाला गांधी हूं या बदल चुका हूं। उन्होंने जवाब दिया- मैं वही गांधी हूं।’ तब में गांधी जी 73 साल के थे। उनकी गिरफ्तारी के वक्त सबको लग रहा था कि कहीं यह गांधी जी से उनकी अंतिम मुलाकात न हो। कस्तूरबा बहुत भावुक हो गईं। वे गांधी जी के साथ गिरफ्तारी देकर उनके साथ रहना और देखभाल करना चाहती थीं। लेकिन गांधीजी की इच्छा कुछ और थी। इसलिए बा ने सार्वजनिक सभाओं में ‘करंगे या मरंगे’ की प्रतिज्ञा को दुहराते हुए गिरफ्तार होने का रास्ता चुना। उन्होंने डबडबाई आंखों से गांधी जी को जाते देखा। महादेव देसाई की गिरफ्तारी के वक्त उनके छोटे-से बेटे नारायण देसाई ने पूछा- काका! क्या अब हम फिर कभी मिल पाएंगे। महादेवभाई ने भावुक होकर बेटे को सीने से लगा लिया और उनके माथे को चूमकर विदाई ली। वाकई इस बार जेल यात्राएं बा और महादेवभाई के लिए अंतिम सिद्ध होने जा रही थीं। पूना के आगाखां पैलेस में गांधीजी ने एक-एक करके अपने दो सबसे करीबी साथियों को खो दिया- पहले महादेवभाई नहीं रहे और फिर लंबी बीमारी से जूझने के बाद बा भी चल बसीं। महादेवभाई की मृत्यु का कारण तो व्यथित कर देने वाला है। दरअसल, उनसे व्यक्ितगत बातचीत में गांधी जी आमरण अनशन की अपनी योजना का जिक्र बार-बार कर रहे थे। महादेवभाई और अन्य लोग उनसे ऐसा न करने का आग्रह कर रहे थे। लेकिन गांधी जी का हठीला स्वभाव सभी को पता था। महादेवभाई गांधी जी की मृत्यु की आशंका से इतना भयभीत हो गए कि इसी चिंता में घुलकर उनके प्राण चले गए। उनकी अकाल मृत्यु से स्तब्ध गांधी जी ने यह योजना छोड़ दी। अंग्रेजी सरकार गांधी जी से किस कदर नफरत करती थी, इस आंदोलन ने यह भी दिखाया। जब एक लम्बे उपवास के दौरान जेल में उनकी हालत बहुत बिगड़ गई तो ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल और वायसराय लिनलिथगो ने उनकी रिहाई की बात सोचने के बजाए अंत्येष्टि की तैयारियां शुरू कर दीं। यहां तक कि उनकी मृत्यु के बाद देश भर में उभरने वाले भावनात्मक उफान को कुचलने के लिए मार्शल लॉ जसी योजनाएं भी तैयार की जाने लगीं। 10 में चौरी चौरा की हिंसक घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लेने वाले गांधी जी ने इस बार हिंसा की आलोचना करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी सरकार द्वारा की गई हिंसा कहीं ज्यादा क्रूर और भर्त्सना करने योग्य है। इस तरह, भारत छोड़ो आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन के एक नए पड़ाव का सूचक था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी गई थी। अब आजादी सिर्फ समय की बात थी।ड्ढr लेखक इतिहास में शोध कर रहे हैं

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