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कोई एसा क्यों है?

हर इंसान को आत्मग्लानि होती है कुछ न करने की, तो कभी कुछ करने की। बेतहाशा खर्च किया या फिर समय का पाबंद न हुआ, तो आत्मग्लानि। किसी से प्यार करने पर भी आत्मग्लानि और किसी से नफरत करने पर भी। कभी-कभी तो ग्लानि पर ग्लानि होने लगती हे। ग्लानि है क्या? ग्लानि का अर्थ है- मन में किसी काम को करने का खेद होना। या अपनी गलती को महसूस करते हुए मन में शिथिलता और खिन्नता पैदा होना। हरदम अच्छा बनने और हर किसी को खुश करने की कोशिश बीमारी बन जाती है। इंसान ‘मैं ऐसा क्यों हूं’ या ‘मैं वैसा क्यों हूं’ के चक्कर में परशान हो उठता है। जसा है, वैसा है में खुश रहना चाहता है। असल में, इंसान ऐसे लोगों से घिरा रहता है, जो दूसरों को नियंत्रित करते हैं, उनका मूल्यांकन करते हैं और आत्मग्लानि का आभाव कराते रहते हैं। ऐसों को हिदायत है कि दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदल कर दिखाइए। आत्मग्लानि को इन्द्रियों को नियंत्रित करने की अदृश्य शक्ित कहा गया है। अक्सर लोग-बाग दूसरों पर काबू पाने के लिए आत्मग्लानि का अहसास जगाते हैं और खुद की कमजोरियां छिपाते हैं। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि आत्मग्लानि का अहसास संवेदना नहीं है। यह किसी क्रिया या अनुभव का जवाब है। आत्मग्लानि दिमागी सोच है। इससे काफी ऊरा खपती है। इसके नकारात्मक प्रभाव को जानने के बाद बचा जा सकता है। अगर कोई सदा स्वयं की दूसरों से तुलना करता है, तो वह स्वयं ही अहंकार या ईष्र्या का शिकार हो जाएगा। बात-बात पर खुद को कोसना छोड़िए। अपनी सीमाओं में रह कर, बेफिक्री से वह सब कुछ कीािए, जो दूसरों को ठेस न पहुंचाए। हर इंसान के लिए चित्त आजादी, नैतिक आचरण और सदाचार का सिद्धांत अलग-अलग हो सकता है। यानी हर इंसान को अपने देश, धर्म, परिवार के मद्देनजर एक रेखा खींचनी होगी, तभी पूर्ण सदाचार के नियम-कायदे तय होंगे। इस लक्ष्मण रेखा से परे सब इंसान को आजादी है, मर्जी है।

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