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ओछी राजनीति दुर्भाग्यपूर्ण

सुषमा स्वराज ने अहमदाबाद बम विस्फोटों पर पिछले दिनों जो बयान दिया वह दर्शाता है कि आज की राजनीति कितनी ओछी हो गई है। नेता दिन-प्रतिदिन अपनी साख खो रहे हैं। संसद में नोट की गड्डियों वाली घटना के बाद यह दूसरी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। संवेदनशील मुद्दों पर किस तरह का बयान देना चाहिए, अगर नहीं पता है तो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से राय लें।ड्ढr हिदायत खां, कालकाजी, नई दिल्ली साहित्यकारों के प्रति बेरुखी वयोवृद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के व्यक्ितत्व एवं कृतित्व से भला कौन अनभिज्ञ हो सकता है। एक साहित्यकार समाज में व्याप्त विसंगतियों को देखता है। उसे लेखनी के माध्यम से कागज पर उतारता है। विष्णु प्रभाकर ऐसे ही मनीषी हैं। इस समय वह अपनी शतायु के करीब हैं। जब भी वह अस्पताल में रहे। शीला दीक्षित, प्रतिभा पाटिल, सोनिया गांधी आदि विशिष्ट जन उनकी खरखबर लेने अस्पताल गए। उन्होंने एक स्वर में कहा उनके इलाज में जो भी खर्च होगा सरकार उसे वहन करगी। लेकिन सरकारी सहायता पाने के लिए उन पर अनेक कायदे कानून लाद दिए गए। सरकार साहित्य मनीषियों के प्रति बेपरवाह है।ड्ढr दिलीप कुमार गुप्ता, बरली यह तो होना ही था सम्पादकीय ‘वही तरकश वही बाण’ पढा, काफी सामयिक तथा सटीक लगा। बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया गया। कॉर्पोरट के क्षाफे से भला महंगाई रुकी है तो ये जनता की चमड़ी उधेड़ने को एक और कदम भर है। फिर उन अनुमानों का क्या कि सरकार बचाने तोड़ने के चक्कर में जब पैसों का खुला खेल हुआ तो और क्या उम्मीद की जा सकती है। वैसे आपने सही ही कहा कि क्लासिकल टेक्स्ट फामरूले से महंगाई मुद्रास्फीति तो क्या कम होगी, हां तमाम तरह के बैंक र्को जरूर महंगे जो जाएंगे। क्या महंगे बैंक लोन और भीषण महंगाई के खूनी पंजों से इस देश की असहाय जनता को राजनीतिज्ञ, न्यायविद अथवा अर्थशास्त्री मुक्ित दिलाने के लिए आगे आएंगे?ड्ढr सुरन्द्र त्रिपाठी, आर. के. पुरम, नई दिल्ली किसको हैरत? नेताओं द्वारा पाला बदलने का जनता पिछले कई सालों से दीदार कर रही है। क्या किसी ने नटिनी को बांस पर चढ़ते हुए घूंघट करते देखा है? जनता भी दूध के धुले को पहचानती है। जनता ऊब चुकी है। रंगमंच पर एक ही प्रकार के ड्रामे को देख-देखकर। वह एक नई जम्हूरियत चाहती है। रो-रो एक ही भाजी, एक ही दाल, जायका भला कहां से आएगा?ड्ढr राजेन्द्र कुमार सिंह, एच-101, आर्य अपार्टमेंट, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्ली आखिर कब जागेंगे हमार नेता जब मनमोहन सरकार को लोकसभा में बहुमत साबित करना था तो सभी पार्टियों के नेता बहुत सक्रिय थे। कोई सरकार बनाने के लिए प्रयास कर रहा था तो कोई सरकार गिराने के लिए। अब जब देश आतंकवाद की चपेट में है, तो हमार यही नेता चैन की नींद सो रहे हैं। इनकी नींद आज भी नहीं जागी है, जब जम्मू में श्राइन बोर्ड जमीन विवाद को लेकर हो रहे हिंसक प्रदर्शन। आखिर कब जागेंगे हमार नेता।ड्ढr परविंदर पंडवार, मोहाली रामसेतु मुद्दा आगे कुआं, पीछे खाईड्ढr आपको नहीं लगता मेर भाई!ड्ढr जब तक मुद्दा कमेटी सुलझाएगीड्ढr तब तक देश मेंड्ढr नई सरकार बन जाएगी।ड्ढr श्रीचरन, दक्षिणपुरी, नई दिल्ली

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