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अंग्रेज चले गए दस्तूर छोड़ गए !

वायुसेना की एक महिला अधिकारी और एक गैर अधिकारी वायुसेैनिक के बीच विवाह ने वायुसेना में एक विचित्र स्थिति पैदा कर दी है। स्थिति इसलिए विचित्र है क्योंकि परंपराओं और प्रोटोकोल के मुताबिक गैर अधिकारी वर्ग का वायुसैनिक अधिकारियों के साथ सामाजिक समारोहों या पार्टियों में शामिल नहीं हो सकता। उलझन इसलिए भी है कि क्या वह पति के नाते अपनी पत्नी का साथ समारोह में दे सकता है या नहीं? इस सवाल पर वायुसेना ने अधिकारियों की पत्नियों के बीच एक सव्रे भी कराया गया। इस बार में वायुसेना के एयर आफिसर (कार्मिक) एयर मार्शल सुमित मुखर्जी से जब पूछा गया तो उन्होंने इस सव्रे की बात तो मानी, लेकिन इसका ब्यौरा नहीं दिया। उनका कहना था कि जब दो रैंक की बात होती है तो प्रोटोकोल आड़े आता ही है। सेना के समारोहों, अधिकारियों के मैस और पार्टियों का यह दस्तूर है कि ‘पर्सेनल बिलो आफिसर्स रैंक’ (पीबीओआर) यानी गैर अधिकारी वर्ग के जवान अधिकारियों के साथ नहीं खड़े हो सकते। सैन्य परंपराएं पारिवारिक रिश्तों पर किस तरह अपनी अपनी छाया डालती हैं, इसका यह ज्वलंत उदाहरण है। रोचक बात तो यह है कि एसे विवाहों से बचने का कोई रास्ता सेवा नियमों में भी नहीं है। वायुसेना ने इस उलझन को सुलझाने का एक अजीब ही रास्ता बताया है। उसका कहना है कि यदि महिला अधिकारी से विवाह करने वाला जवान इस्तीफा दे दे तो वह सेवानिवृत हो जाएगा और तब वह पति की हैसियत से अपनी पत्नी के साथ अधिकारियों के साथ समारोहों और महफिलों में शामिल हो सकता है। अमेरिका और कई यूरोपीय देशों की सेनाओं में एसी उलझन नहीं है। वहां डय़ूटी के बाद सभी रैंक के अधिकारी व जवान साथ खाना-पीना करते हैं और साथ ही जश्न और महफिल जमाते हैं। लेकिन भारत में अंग्रेजों ने जो कायदे कानून ‘कालों’ के मामले में तय कर दिए, उनका बोझ आज भी सेनाएं लादे फिर रही हैं। शांति सैनिक के नाते विभिन्न देशों में तैनात जवान और अधिकारी दूसर देशों की सेनाओं के अधिकारियों के बीच रिश्तों को देख चकित रह जाते हैं। पर भारत अभी परंपराओं से मुक्त नहीं हो पाया।

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