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बिहार में वाम मोर्चा की प्रतिष्ठा दांव पर

बिहार में वाम मोर्चा की प्रतिष्ठा दांव पर है। पहली बार सूबे के तीनों वाम दलों के एक मंच पर आने के बावजूद बिहार में खाता नही खुला तो वाम दलों की अगली रणनीति क्या होगी। क्या उन्हें फिर क्षेत्रीय दलों की शरण में जाना होगा? क्या पश्चिम बंगाल की तरह बिहार में भी किसी एक वाम दल के छतरी के नीचे चुनाव लड़ने पर विचार करना होगा? या फिर अलग-अलग होकर जमीनी स्तर पर कैडरों की संख्या बढ़ा कर साठ के दशक वाली रणनीति पर काम करेगा वाम मोर्चा। इस बार लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों के सहार बेड़ा पार लगाने की नीति से अलग होकर तीनों मजबूत वाम दल भाकपा माले, सीपीआई और सीपीएम ने प्रदेश के चुनावी इतिहास में पहली बार एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा।ड्ढr ड्ढr वाम दलों के नेताओं का दावा है कि एका का असर उनके द्वारा लड़ी जा रही सभी 33 सीटों पर दिखने वाला है। कम से कम दो सीटों पर तो पासा पलटने के आसार है। वाम मोर्चा बेगूसराय और आरा में सीधी लड़ाई में है। इसके साथ ही माले सीवान और पाटलिपुत्र, सीपीआई बांका और सीपीएम सुपौल और उजियारपुर में भी अपनी जीत के प्रति आशान्वित है। वाम मोर्चा बेगूसराय के सांसद रहे सीपीआई उम्मीदवार शत्रुघ्न सिंह की जीत दोहराने का दावा कर रहा है। वहां सभी वाम नेताओं ने दौरा कर लेनिनग्राद कहे जाने वाले अपने इस किले पर चढ़ाई करने की भी पूरी कोशिश की है। आरा क्षेत्र से तो माले पहले भी लोकसभा पहुंच चुका है। आरा के सहार, संदेश आदि क्षेत्रों में माले की जमीनी पकड़ है और खेतिहरों के लिए वह लगातार लड़ता रहा है।ड्ढr ड्ढr दरअसल चुनाव जीतने के लिए वाम मोर्चा ने इस बार संयुक्त अपील जारी की। ‘वामपंथ को आगे बढ़ायें, जनता और जनसंघर्षो की जोरदार आवाज को संसद में पहुंचायें।’ भाकपा माले के राज्य सचिव नन्दकिशोर प्रसाद, सीपीआई के राज्य सचिव बद्रीनारायण लाल और सीपीएम के राज्य सचिव विजयकांत ठाकुर ने कहा कि जनता की जीविका और कल्याणकारी योजनाओं के प्रति दिल्ली और पटना की सरकारों की उपेक्षा जगजाहिर है। एक तरफ यूपीए और एनडीए दोनों ही गठबंधनों में टूट और बिखराव है तो सुशासन और विकास की ढोल पीटनेवाली नीतीश सरकार पूरी तरह सामंत-दबंग और नौकरशाहपरस्त साबित हुई है।ं

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