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रैगिंग के डर ने कैदी बना दिया

मेडिकल छात्रों कीोिंदगी कैदी की तरह हो गई है। सुबह लाइन लगाकर क्लास मेंोाना, दोपहर बाद हॉस्टल में वापसी और फिर कहींोाने की क्षाात नहीं। इसके बावाूद प्रथम वर्ष के छात्रों की दो बार रैगिंग हो चुकी है। इससे व्यथित कई अभिभावकों ने कुलपति से अपनी पीड़ा का क्षहार किया है।ड्ढr रैगिंग रोकने के लिए चिकित्सा विश्वविद्यालय प्रशासनोो प्रयास कर रहा है उससे खुद अभिभावक संतुष्ट नहीं हैं। बुधवार को प्रशासनिक अधिकारियों से वार्ता करने आए कई अभिभावकों का कहना था कि उनके बच्चे मेधावी छात्र हैं न कि कैदी।ोिस तरह से संस्थान में उनको कहींोाने और किसी से मिलने की क्षाात नहीं है उससे उनके मन में कुंठा भर रही है। दरअसल रैगिंग रोकने के नाम पर प्रशासन ने एमबीबीएस व बीडीएस प्रथम वर्ष के छात्रों को निाी सुरक्षा गार्डो के साए में कक्षाओं में ोने का दौर शुरू किया है। इसके बावाूद छह दिन में दो बार छात्रों की रैगिंग हो चुकी है। चार अभिभावकों ने खुद प्रशासन से रैगिंग की शिकायत की है। इसके बावाूद किसी वरिष्ठ के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई। अभिभावकों का कहना है कि रैगिंग की साा सीनियर को मिलनी चाहिए लेकिन चिविवि में उलटा हो रहा है। रैगिंग करने वाले छात्रों पर कार्रवाई नहीं होती और केवल नए छात्रों पर ही सारी बंदिशें लाद दी गई हैं। अभिभावकों ने प्रशासनिक अधिकारियों से कहा है कि उनके बच्चों का सीनियर के साथ मेलाोल कराना चाहिए। इससे रैगिंग की संभावना कम होती है। साथ ही यदि रैगिंग के नाम पर कोई मारपीट या अश्लील हरकत कर तो प्रशासन को कार्रवाई करनी चाहिए।ं

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