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सिमी पर सियासत

टुडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) को लेकर सरकार और गुप्तचर संगठनों की लापरवाही तथा कुछ राजनैतिक दलों द्वारा की जा रही बयानबाजी दुर्भाग्यपूर्ण है। 1में जन्मे और 2001 से प्रतिबंधित इस अतिवादी संगठन से यदि उच्च न्यायालय न्यायाधिकरण ने रोक हटाने का आदेश दिया तो उसका कारण गृहमंत्रालय की चूक ही है। उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को तीन हफ्ते के लिए स्थगित कर दिया, जिससे केन्द्र सरकार को भूल सुधार का अवसर मिल गया है। सिमी की हिंसक वारदातों को साबित करने के लिए उसने अगर अब भी पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए तब प्रतिबंध जारी रखना कठिन हो जाएगा। महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात आदि राज्यों में हुए विस्फोटों के पीछे सिमी का हाथ होने का आरोप लगातार लगता आया है। इस संगठन की विचारधारा और गतिविधियां देशद्रोह की श्रेणी में आती हैं। ओसामा बिन लादेन को अपना आदर्श समझने वाले सिरफिर लोगों के साथ नरमी नहीं बरती जा सकती। यदि तमाम हिंसक घटनाओं के बावजूद सरकार इस संगठन के विरुद्ध अदालत में ठोस सबूत नहीं दे पाई तो इसे उसकी इच्छाशक्ित का अभाव ही कहा जाएगा। इस इच्छाशक्ित के अभाव की वजह कहीं वोट की राजनीति तो नहीं है? संप्रग सरकार के मंत्री और सहयोगी दलों के नेता सिमी के समर्थन में जिस तरह के बयान दे रहे हैं, उससे इस शक की पुष्टि होती है। यदि सिमी पर लगाया गया प्रतिबंध गलत है तो जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को यह बात मंत्रिमंडल की बैठक में कहनी चाहिए।ड्ढr यह सही है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए अकेले सिमी को कटघर में खड़ा नहीं किया जा सकता। कुछ अतिवादी हिन्दू संगठन भी समाज में विग्रह पैदा करने के जिम्मेदार हैं। मुम्बई में हुए दंगों की जांच के लिए बैठाए गए श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट में शिव सेना के कुछ नेताओं को कसूरवार ठहराया था, किन्तु अभी तक दोषियों को दंड दिलाने का गंभीर प्रयास नहीं किया गया। जो कदम उठाए गए वे भुस पर गोबर लीपने जसे हैं। अन्याय के दमन को लेकर दोहर मापदंड नहीं हो सकते। सिमी पर प्रतिबंध उचित है तो बदअमनी फैलाने वाले हिन्दू संगठनों को छूट कैसे दी जा सकती है?ड्ढr

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