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गंदगी में खत्म होती जिंदगी

दुनिया में खुले में शौच जाने वाले प्रत्येक दो व्यक्ितयों में एक भारतीय है। यह उन अनेक घिनौनी हकीकतों में एक है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ ने उाागर किया है। इनकी रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में 1.2 अरब लोग खुले में शौच करते हैं क्योंकि उन्हें शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इनमें से आधे से अधिक लोग भारतीय हैं। इस देश के 66.70 करोड़ लोगों के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि वे खुले में मलत्याग करं। यह उस देश का हाल है, जो अपनी जनता को यह यकीन दिलाना चाहता है कि वह दुनिया की एक उभरती आर्थिक महाशक्ित है। फिर, क्या कारण है कि पानी और ऊरा जसी अनेक जरूरतों की तुलना में सेनिटेशन (स्वच्छता) के मसले को अपेक्षाकृत कम प्राथमिकता दी जाती है? क्या इसका कारण मध्यवर्ग के लोग हैं, जो शौचालय की सुविधा वाले स्थायी मकानों में रहते हैं और इसके मद्देनजर सेनिटेशन कोई मसला नहीं बनता? लेकिन पानी और बिजली उनके लिए महत्वपूर्ण मसले हैं। क्या इसका कारण यह है कि यह समस्या मूल रूप से गरीबों और बेघर लोगों की है? क्या इसका कारण यह भी है कि इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित महिलाएं होती हैं? जब कभी मैं एक महिला को उसके दो बच्चों के साथ जाते हुए देखती हूं तो प्रतिदिन मेर जेहन में कई सवाल उठते हैं। यह एक कूड़ा बीनने वाली महिला है। उसे एक सरकारी कॉलोनी के इलाके में कूड़ा बीनने की इजाजत दी गई है। आम तौर पर वह कूड़ेदान के पास सो जाती है। हाल में उसे वहां से हटने के लिए कहा गया। इसलिए उसने कॉलोनी में अन्य स्थान तलाश लिया है। वहां कुछ प्लास्टिक बैगों के साथ वह सो जाती है, जिनमें उसकी छोटी-मोटी चीजें रखी होती हैं।ड्ढr इस महिला द्वारा पुन: इस्तेमाल और रिसाइक्लेबल चीजें बीनने के बाद प्रतिदिन म्युनिसिपल ट्रक कूड़ेदान से कूड़ा उठाकर ले जाता है। महिला के सिर पर कोई छत नहीं है, यद्यपि कूड़े में मिली चीजें बेचकर वह कमाती है। पानी या सेनिटेशन की सुविधा उसे प्राप्त नहीं है। उसके बच्चे खुले में शौच करते हैं। मुझे नहीं पता कि वह कहां शौच जाती है। संभवत: एकांत स्थान के लिए रात के अंधेरे का उसे इंतजार करना पड़ता है। इसके बावजूद वह मुंबई के एक बेहद महंगे इलाके में रहती है और उन लोगों का कूड़ा बीनती है, जो सरकारी कर्मचारी-अधिकारी हैं। इस महिला की जिंदगी एक कुतूहल से कहीं अधिक है। यह एक वीभत्स हकीकत बयां करती है। गरीब लोगों के लिए सेनिटेशन का अभाव सिर्फ व्यक्ितगत पसंद या घोर तिरस्कार का सवाल नहीं है। यह कई बीमारियों के फैलने का भी मुख्य रूप से जिम्मेदार कारण है। अंतरराष्ट्रीय परोपकारी संगठन- वाटर एड ने जापान में आयोजित जी-8 की बैठक में विश्व नेताओं के लिए इस मसले पर आंकड़े एकत्र किए थे। उसके मुताबिक दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी के पास सेनिटेशन की बेहतर सुविधाएं नहीं हैं। मलेरिया, एच.आई.वी. एड्स और खसर से होने वाली कुल मौतों की तुलना में उपरोक्त दूषित वातावरण से कहीं ज्यादा संख्या में बच्चे मौत के शिकार हो जाते हैं। वाटर एड का मानना है कि बेहतर सेनिटेशन की व्यवस्था के जरिए प्रतिवर्ष 0,000 बच्चों की मौत टाली जा सकती है। इसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि एक अनुमान के मुताबिक प्रतिवर्ष डायरिया से होने वाली मौतों में से 85 प्रतिशत का संबंध सेनिटेशन की खराब स्थिति और असुरक्षित पेयजल से है।ड्ढr इनमें से कोई भी हकीकत नई नहीं है। फिर भी कुछ साल बाद नई रिपोर्टे जारी होती हैं और वाटर एड जसे संगठन अभियान चलाते हैं। विश्व के नेतागण उनकी चिंता को जायज बताकर बयान जारी करते हैं, पर कारगर कदम नहीं उठाए जाते।ड्ढr सहस्रब्दी विकास लक्ष्यों (एमजीडी) के तहत 2015 तक प्राप्त किए जाने वाले विकास लक्ष्यों के प्रति भारत ने सहमति व्यक्त की है। इनमें एक लक्ष्य देश की 46 प्रतिशत आबादी तक सेनिटेशन सुविधाओं का विस्तार करना है। इसके बावजूद इस लक्ष्य में भारत पिछड़ रहा है।ड्ढr तो फिर सवाल उठता है- क्यों? ऐसा क्यों, जब हम एक परमाणु शक्ित के बतौर मान्यता पाना चाहते हैं, क्यों, जब हम एक उभरती आर्थिक शक्ित के रूप में मान्यता पाना चाहते हैं, क्यों, जब हम अपने शिक्षित और प्रशिक्षित मानव शक्ित पर गर्व करते हैं? क्या हमें सेनिटेशन के मसले पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए?ड्ढr इसका एक कारण है, जसा कि मैंने ऊपर कहा, अत्यंत कमजोर वर्ग के लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। जिन लोगों के पास नीति निर्धारण की शक्ित है, वे इस मसले पर अधिक ध्यान देने की जरूरत महसूस नहीं करते। इस प्रकार इस मसले को कम प्राथमिकता दी जा रही है।ड्ढr दूसरा कारण, स्वच्छ और स्वस्थ जीवन मात्र एक व्यक्ितगत पसंद बना दिया गया है। स्वास्थ्य का मतलब यह लगाया जाता है कि हम क्या खाते या नहीं खाते हैं, हम कितना व्यायाम करते हैं, किस तरह का व्यायाम करते हैं, कौनसी औषधियों का सेवन करते हैं, किस तरह के डॉक्टर से इलाज करवाते हैं। लेकिन, तब क्या होता है, जब आप किसी ऐसे इलाके में रहते हैं, जहां पानी की कोई पाइपलाइन नहीं है, कोई सीवरा नहीं है। आप कैसे कोई व्यक्ितगत पसंद रख सकते हैं, जब आपके आसपास का माहौल आपके स्वच्छ व स्वस्थ रहने की इच्छा को नकारता हो?ड्ढr प्रतिदिन कूड़ा बीनने वाली ऊपर बताई गई महिला इसी हकीकत से रू-ब-रू होती है। उसके अन्य सगे-संबंधी शायद झुग्गी-बस्तियों में रहते हैं- कई बाढ़ से प्रभावित इलाकों में रहते हैं, जहां न तो पानी और न ही सीवरा की सुविधा कभी प्रदान की गई। कुछेक बार शौचालयों के निर्माण के लिए नगर निगम को फंड्स मिलते हैं। उन्हें उन जगहों पर बनाया जाता है, जहां की जमीन पहले से आर्द्रता भरी है और शौचालयों का अपशिष्ट (वेस्ट) सोखने की उसकी क्षमता नहीं बची है। नतीजतन, बहुत कम समय में शौचालय ब्लॉक होकर ओवरफ्लो होने लगते हैं। लोगों को मजबूरन शौचालयों के आसपास खाली स्थान पर शौच जाने के लिए विवश होना पड़ता है। इससे फैली गंदगी और दूषित माहौल के लिए इन्हीं लोगों को दोषी ठहराया जाता है। यदि मुझसे पूछा जाए कि देश में अगले चुनाव में किसी पार्टी के सत्ता में आने पर मेरी इच्छा-सूची क्या होगी तो मैं इसमें शौचालयों को सर्वोच्च स्थान पर रखूंगी। बेशक, आजीविका भी महत्वपूर्ण है। पक्के मकान भी उतने ही जरूरी हैं। पानी और बिजली भी। लेकिन, व्यक्ितगत या साझा शौचालयों से जुड़ी सीवरा प्रणालियां हमार अनेक शहरों की शक्ल-सूरत बदल देगी और करोड़ों गरीब लोगों को भारी राहत तथा गरिमा प्रदान करंगी।ड्ढr ं

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  • Web Title: गंदगी में खत्म होती जिंदगी