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बुरा मानो या भला : किसकी नार लगी हमारे आम को

आम के लिहाज से यह मेरी जिंदगी का बेहतरीन साल था। उसकी शुरुआत अलफोंसो से हुई। मुंबई से तवलीन सिंह ने एक पेटी आम की भिजवाई। वह हर साल एक आम के एक्सपोर्टर को कुछ दोस्तों की फेहरिश्त देती हैं। उनमें मैं भी हूं। सो, हर साल अलफोंसो खाने को मिल जाते हैं। अपने यहां से अलफोंसो ही सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट होता है। उसे यहां का बेहतरीन आम माना जाता है। मैं मानता हूं कि वह अच्छा होता है। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के यमुना-गंगा दोआब में होने वाले आमों की बात ही कुछ और है। यह लखनऊ और दिल्ली के बीच की पट्टी है। तवलीन के आमों के कुछ वक्त बाद ही दशहरी की पेटी आ गई। इसे लखनऊ के पास एक बाग से परवीन तल्हा ने भेजा था। मैंने उससे बेहतर आम खाए ही नहीं थे। सवाल उठा कि क्या विदेशी लोग दशहरी के बार में जानते हैं? फिर रठौल आए। छोटे, ठोस और स्वादिष्ट। मेरी उम्र के लोगों के लिए उसका आकार-प्रकार बिल्कुल ठीक है। मुझे सबसे ज्यादा आम भेजनेवाले आबिद सईद खान हैं। बुगरासी में उनके बड़े बाग हैं। यह दिल्ली से तीन घंटे की दूरी पर है। वह थोक में आम भेज देते हैं। इस बार उन्होंने चौसा और लंगड़ा भेजा। वे इतने ज्यादा थे कि उसे मैंने अपने दोस्तों, भाइयों और रिश्तेदारों में बांट दिया। उनका स्वाद भी पिछले सालों से बेहतर था। मेर कहने पर आबिद ने एवोकेडो पेड़ पांच साल पहले लगाए थे। अगले साल वह फल देने लगेंगे। अगर मैं दुनिया में रहा, तो अपने खाने के साथ एवोकेडो की सलाद खाऊंगा। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि क्या अपने बेहतरीन आम मध्य पूर्व, यूरोप और अमेरिका में मिल पाते हैं। मस्कट, दुबई और रियाद में रहने वाले मेर दोस्त बता रहे थे कि सीजन में आम खूब मिलते हैं वहां। लेकिन वे आम हिंदुस्तान से नहीं पाकिस्तान से आते हैं। पाकिस्तानियों ने मध्य पूर्व का बाजार हमसे छीन लिया है। उनके आम भी अच्छे होते हैं, लेकिन हमसे बेहतर नहीं होते। तब पाकिस्तान ने हमें पीछे क्यों छोड़ दिया? यह सवाल मैंने आबिद सईद खान से पूछा। उनका जवाब था, ‘अपने देश में एक्सपोर्ट करने वालों के लिए कोई योजना ही नहीं है। पाकिस्तान में उन्हें तवज्जो दी जाती है। हमें आम से बनने वाली चीजें मसलन पना, अचार और आम के बीज पर जोर देना चाहिए। आम के बीज से तमाम दवाई बनाई जा सकती हैं। वह एक अलग उद्योग हो सकता है। जहां तक पना की बात है आजकल हल्दीराम को छोड़ कर ज्यादातर लोग उसे घर पर ही बनाते हैं। उसे बेहतर क्वालिटी का बनाना चाहिए। आधुनिक मानदंडों के मुताबिक।’ वह कहे चले जा रहे थे। आम की शान में बोले जा रहे थे। एक वक्त था, जब दुनिया में हम सबसे ऊपर थे। वह जगह अब नहीं है। अपनी वही जगह कायम करने के लिए हिंदुस्तान को क्या करना चाहिए? इस पर काफी कुछ बताने के बाद वह बोले, ‘हम फलों के बादशाह से दुगनी कमाई कर सकते हैं।’ वह पूर भरोसे और दावे से कहते हैं। गीत गाया पत्थरों नेड्ढr ‘अ हिस्टरी ऑफ एन्शियंट ऐंड अर्ली मीडिएवल इंडिया फ्रॉम द स्टोन एज टू द ट्वेल्फ्थ सेंचुरी’ चर्चित इतिहासकार उपिंदर सिंह की लाजवाब किताब है। यह हिंदुस्तान के मशहूर प्रकाशक पियर्सन से आई है। पहले तो यह थोड़े में अपने प्राचीन इतिहास को साहित्य और पुरातत्व के आधार पर समझने की कोशिश करती हैं। वह पत्थर के हथियारों का जिक्र करती हैं। मैं तो गंभीर आदमी हूं नहीं। मुझे तो उस पर सालों पुराना हिंदी गाना याद आया,‘गीत गाया पत्थरों ने’। यह किताब तो दरअसल एक एन्साइक्लोपीडिया है। चित्र, मानचित्र, चार्ट और बॉक्स के सहार हमें अपने पूर्वजों के बार में बहुत कुछ जानने को मिलता है। यह लगती तो कॉलेज के बच्चों के लिए है। लेकिन उसकी साढ़े तीन हाार रुपए कीमत तो आम छात्रों की पहुंच से बाहर है। हिन्दी और अंग्रेजी में उसका सस्ता संस्करण आना चाहिए। उपिंदर के बार में दो छोटे-छोटे ब्योर हैं। वह शादी शुदा हैं। उनके दो बेटे हैं। उन्होंने कनाडा के एम गिल से पीएचडी की है। दिल्ली के सेंट स्टीफंस में 14 साल इतिहास पढ़ाने के बाद वह दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हो गई हैं। उन ब्योरों में यह कहीं नहीं लिखा है कि वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी हैं। जानबूझकर उसे न बताना उनके कद को बढ़ाता है।

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