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तुलसी रघुनाथ गाथा

ल तुलसी जयंती थी। गोस्वामी तुलसीदास का नाम आते ही मन अजीब सा हो जाता है। उनकी निजी जिंदगी आंखों को नम कर देती है। और आध्यात्मिक जिंदगी आनंद से भर देती है। निजी जिंदगी में तुलसी को प्यार मिला ही नहीं। बचपन का बुरा हाल था। एक खास नक्षत्र में जन्म लेने की वजह से माता-पिता ने उन्हें दर-दर भटकने को छोड़ दिया था। शादी हुई भी, तो चली नहीं। लेकिन राम की शरण में आकर गोस्वामी जी को सब-कुछ मिला। माता-पिता तो नहीं मिले, लेकिन जगत पिता की तरह राम और जगत माता की तरह सीता मिलीं। रिश्तों के लिहाज से उन्होंने जिंदगी को जिया ही कहां? लेकिन रामचरित में उन्होंने वह सब जिया, जिसे वह जीना चाहते थे। अपनी हर कमी को उन्होंने मानस में पूरा किया। बचपन उनका खराब बीता था। मानस में उन्होंने ‘ठुमुक चलत रामचंद्र’ की छवि देखी। परिवार का सुख नहीं देखा। लेकिन आदर्श परिवार को दिखाया। उनको पत्नी सुख नहीं मिला, तो सीता जसी पत्नी का आदर्श पेश किया। उनका समाज बुरे हाल में था। सो, उन्होंने रामराज्य का सपना देखा। तुलसीदास को राम का सहारा मिला था। राम उनके साथ इस कदर जुड़ गए कि वह किसी और को स्वीकार ही नहीं कर सके। ‘तुलसी मस्तक तब झुकै जब धनुष-बाण लिए हाथ।’ राम उनके लिए ब्रह्म हैं। दीनबंधु और गरीबनेवाज हैं। करुणानिधान हैं। कृपानिधान हैं। लोकमंगल विधायक हैं। जिंदगी के आम संदर्भो में वह किसीको कुछ नहीं दे सकते थे। आखिर एक संत किसीको क्या दे सकता है? और जो वह देता है, उसे कौन दे सकता है? तुलसी ने भी जो दिया है, उसका क्या हिसाब-किताब करं? उत्तर भारत की संस्कृति तो तुलसी के बिना अधूरी है। हम शिव की भक्ित करते हैं, तो ‘नमामीश मीशां निर्वाण रूपं’ से। ‘आशुतोष शिव औढर दानी, आरति हरउ दीन जन जानी’ को हम मंत्र की तरह जपते हैं। राम के लिए तो रामचरित मानस है ही। हनुमान की आराधना करनी हो, तो हनुमान चालीसा गोस्वामी जी का ही लिखा हुआ है।ं

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