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सोलह दूने आठ यानी तड़कामार पॉलिटिक्स

लालू जी ने कुछ कहा। मोदी जी, आडवाणी जी, वरुण गांधी, मुलायम सिंह से लेकर मनमोहन सिंह आजकल जो कुछ बोलते हैं, उसके गहरे अर्थ निकाले जाते हैं। सच यह है कि इन दिनों कही गई बातों के कोई माने नहीं होते। हमारे मन उत्सुक, व्यग्र और उत्तेजित हैं। ज्यादातर लोग ऊँचे स्वर में बोल रहे हैं। और सुनने वाले ऊँचे के बजाय फुसफुसाहट भर स्वरों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। जो नहीं कहा गया है, उसे ही कहलाना चाहते हैं। टी-ट्वेंटी के बावाूद राजनीति की मार्केटिंग बेहतर हो रही है। ऐसे माहौल में प्रियंका गांधी का कहना है कि मैं राजनीति में नहीं आऊँगी। वे किसी का चुनाव प्रचार करतीं हैं तो क्या यह राजनीति नहीं है? कुछ लोग सत्ता की राजनीति नहीं करते। कुछ लोग करते हैं। वोट कटुवा राजनीति क्या व्यक्ित को कुछ नहीं देती? और वोट दिलाऊ राजनीति क्या है? राजनीति से यादा अंतर्विरोध कहाँ मिलेंगे? इससे सांीदा काम कोई नहीं और जो बेहूदगी इस मैदान में संभव है, उसका कोई मुकाबला नहीं। पहले आम चुनाव से अब तक हर चुनाव खास था। 1े चुनाव संघीय व्यवस्था और राज्य पुनर्गठन की पृष्ठभूमि में हुए थे। 1में गैर-कांग्रेसवाद अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में उाागर हुआ था। 1ने केन्द्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार दी। सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ जनाक्रोश की अभिव्यक्ित हुई। पर जो गुस्सा उत्तर में था, वह दक्षिण में नहीं था। रायबरली ने इंदिरा गांधी को हराया तो दक्षिण भारत ने जिताया। 1े चुनाव जातीय अंतर्विरोधों को उाागर करने काोरिया बने। चुनाव व्यवस्था न होती तो सामाजिक अंतर्विरोध इस तरह उाागर न होते। सम्प्रदायिक अंतर्विरोध भी राजनैतिक व्यवस्था के कारण खुले। यह सही था या गलत, पर अस्वाभाविक नहीं था। पिछले साल जम्मू में और उसके समांतर श्रीनगर में जो आंदोलन हुए, वे हमार अंतर्विरोध थे। पाकिस्तान में आज जो हो रहा है, वह उस समाज का अंतर्विरोध है। उन्होंने धार्मिक आधार पर एक देश बनाया है। उसकी तार्किक परिणति है, शरिया का शासन। यदि कुछ लोग उसमें आधुनिक और बुरा न मानें तो धर्मनिरपेक्ष राजव्यवस्था के तत्व जोड़ना चाहते हैं, तो उन्हें जनता को समझाना होगा कि वहोरूरी क्यों है। धर्म-ााति-भाषा और क्षेत्र के सवाल भावना के सवाल हैं। महंगाई, रोÊागार, शिक्षा और स्वास्थ्य जीवन केोरूरी सवाल हैं। इन दोनों का मिलन तभी संभव है, जब एक कौम यानी राष्ट्र हो। भारत ने पिछले 62 साल में या उससे कई सौ साल पहले से अपनी कौमी बहुलता को पहचान लिया था, जो हमार संत कवियों की रचनाओं में दर्ज है। अंतर्विरोधों के बावजूद अर्थव्यवस्था और राजनीति ने तमाम भावुक जन समूहों को एक धागे में जोड़ दिया है। जसे अमेरिका एक सुदृढ़ व्यवस्था के भीतर बहुरंगी विश्व है, करीब वैसा। हम समझते हैं कि पाकिस्तान को भी वैसा बनना चाहिए। पर यह बहुलता सिर्फ इस्लाम के धागे में नहीं पिरोई जा सकेगी क्योंकि राजनैतिक इस्लाम का सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय रूप कोई नहीं वर्ना सार इस्लामी समाजों का एक देश न होता। इस बार के हमार चुनावों में दो बातें खासतौर से सामने हैं। एक तो राजनैतिक शक्ितयों का विखंडन है। मतदाता के सामने एसी राजनैतिक शक्ितयाँ हैं, जो नेताओं की जागीर सरीखी हैं। यह कमाोरी सिर्फ क्षेत्रीय पार्टियों की ही नहीं है। कांग्रेस पार्टी भी परिवार के भरोसे है। भाजपा भी अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्ितगत करिश्मे के सहार ही चल पाई। वामपंथी पार्टियों के पास न तो करिश्मा है, न संगठन और न विचार। ज्यादातर राजनैतिक दल दलदल में धँसे हैं। एसे में जनता को अपने इलाके की सड़क, पानी-बिजली और रोगार के आगे कुछ नहीं सूझता। जिस न्यूक्िलयर डील को लेकर पिछले साल संसद में हंगामा हुआ, वह इस चुनाव में कहाँ है? इस चुनाव में आर्थिक उदारीकरण का राजनैतिक असर जरूर देखने को मिल रहा है। शहरी युवा, जो इंजीनियर, डॉक्टर या मैनेजर हैं, इस बार हस्तक्षेप करता नार आता है। यह युवा सिर्फ आईपीएल के नशे में ही नहीं डूबा है। उसे अपनी राजनैतिक भूमिका का भान भी है। परम्परागत राजनीति ने अपराध, जाति और धर्म का बेशर्म इस्तेमाल किया। नया वोटर जनता को बताने का प्रयास कर रहा है कि राजनेता को रास्ते पर लाने की जिम्मेदारी आपकी है। चाय के बहाने वोटर को जगाने वाले जनाग्रह जसे संगठन इस राजनीति के लिए नए हैं। टेक्नॉलाजी ने जानकारी के अधिकार का इस्तेमाल आसान बनाया है। वोटर के पंजीकरण से लेकर वोट देने और उसके बाद अपने प्रतिनिधि को सार्वजनिक प्रश्नों से जोड़ने की कोशिश नया मतदाता कर रहा है। इस चुनाव में यह कोशिश काफी छोटे रूप में नार आ रही है, पर आने वाले वषों में यह विशाल रूप लेगी। कुछ लोग शहरी छोकरों का मााक उड़ाएंगे। उनकी निगाह में राजनीति के लिए अक्ख़ड़, लठैत किस्म के लोग ही काम आते हैं। क्षेत्रीयता और सामाजिक न्याय की जुगाड़ राजनीति अपने उद्देश्य के लिए कितनी ईमानदार रही? काठ की यह हांडी कब तक चढ़ेगी? परम्परागत राजनेता अपने सोच के आगे चीों नहीं देख पाता है। वह आज भी फॉमरूला बना रहा है कि पचास सांसदों का एक गठबंधन बना लिया जाए तो पोस्ट पोल खेल अपना है। यह राजनीति पोस्ट पोल दौर में ही अपनी बेशर्मी का पर्दाफाश करगी। पर जुगाड़-नीति के मायालोक को ध्वस्त करने के लिए जिस राष्ट्रीय सर्वानुमति कीोरूरत होनी चाहिए, वह सत्ता की चाहत रखने वालों के हौसलों से कमतर नहीं है। इसमें मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है और आगे बनेगी। सामान्य व्यक्ित भी समझता है कि व्यवस्था का चुस्त होना उसके लिए कितनाोरूरी है। वह कोऊ नृप होय.. का कायल नहीं रहा। अरसे तक हम उन बातों को मंजूर करते रहे, जो हमें नापसंद थीं। अपराधियों को राजनीति ने जिस तरह गले लगाया, उसे क्या किसी ने देखा नहीं है? उन्हें लगता है कि आम आदमी मूर्ख है। वह अपराधी और राजनेता में फर्क करना नहीं जानता। राजनैतिक नेता कब तक व्यक्ितगत आचरण की अनदेखी करंगे? जनता का दबाव उन्हें मजबूर करगा। राजनेताओं को जमीनी सच का बेहतर ज्ञान होता है, पर कई बार वे अंडर करंट को पढ़ नहीं पाते। इस बार के चुनाव में जनता की समझदारी पहले से बेहतर है। आपराधिक अहंकार को इस बार धक्का लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बहरहाल, राजनेताओं के भाषण नोट करते चलें। एक महीने बाद देखें कि वे क्या कहते हैं। और यह भी देखें कि वे बयान बदलते हैं तो किस खूबसूरती के साथ। श्चद्भoह्यद्धन्ञ्चद्धन्ठ्ठस्र्ह्वह्यह्लड्डठ्ठह्लन्द्वद्गह्य.ष्oद्वड्ढr लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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