DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

और खामोश हो गयी मुखर आवाज

आजसू निर्मल दा के मार्गदर्शन में काम करने लगी। माफियों की तो इसने हवा ही गुम कर दी। नतीजा हुआ कि माफियों ने निर्मल महतो की आवाज आठ अगस्त 1ो खामोश कर दी। एक बारगी तो एसा लगा कि जल उठेगा पूरा झारखंड, लेकिन लोगों ने संयम से काम लिया। मन में दुख भी था और आक्रोश भी, भस्मावगुंठित चिनगारी की तरह। उनकी शवयात्रा में लाखों लोग उमड़ पड़े थे। हर आंख नम थी। हर चेहरा उदास। लेकिन दिल्ली खुश थी। झारखंड को लूटनेवाले खुश थे। जिनके साथ आज झामुमो के सव्रेसर्वा गलवाही डाले फिर रहे हैं, उनके लोग इन खाली घरों में अपनी मोहरं बिछा रहे थे। चाल पर चाल चले जा रहे थे। उनके श्राद्ध के दिन भी समाधि स्थल पर लोगों के बीच छपे पर्चे बांटे गये। और उस तथाकथित बुद्धिाीवी ने आजसू को झामुमो से तोड़ लिया। लेकिन लोगों ने साथ दिया। क्या गांव क्या शहर, लोगों का सैलाब उमड़ पड़ता था झामुमो की सभाओं में। फिर फूलने लगे दिल्ली के हाथ-पांव। सजने लगीं सियासी शतरां की बिसातें। बड़े-बड़े माथापच्ची में लगे, कैसे डालें इनकी जड़ में मट्ठा। लो बैठे बिठाये मौका भी मिल गया।ड्ढr बिहार में एक बड़बोले नेता को सत्ता के सिंहासन पर कब्जा के लिए कुछ माननीयों के समर्थन की दरकार थी। झामुमो ने समर्थन देकर उन्हें सत्ता के सिंहासन पर बैठाया। दो चार लोगों की तो चल निकली मगर बाकी माननीयों की हालत जस की तस रही। पद-प्रतिष्ठा की बात तो दूर, उनमें से किसी को ‘कौवा’ तो किसी को ‘कोयले का पहाड़’जसे विशेषण दिये जाने लगे। लोग कहने लगे-किसी की मजाल थी जो निर्मल महतो के जमाने में मजाक में भी ऐसे शब्द किसी पार्टी कार्यकर्ता के लिए कोई कह दे। यह स्थिति इसलिए आयी कि इस दल के बड़े लोगों को मलाईदार रोटियां खाने की आदत पड़ती गयी। पेट बड़ा होता गया। इच्छाएं अनंत होती गयीं। इस बीच मलाईदार रोटी के दो चार टुकड़े तो अवश्य मिले, लेकिन तलबे भी खूब चटवाये। जिस शील-स्वाभिमान का अवलेप चढ़ाकर निर्मल महतो ने पार्टी की मूरत गढ़ी थी, चंद लोभी-लालचियों ने उस पर कालिख पुतबा ली।ड्ढr वर्ष 1और 2008 में कांग्रेस की सरकार बचाने के लिए दिल्ली में जो कुछ हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। अब बालहठ चल रहा है कि मुझे वही कुर्सी चाहिए। अगले का काम कर देने के बाद भी दाम के लिए चिरौरी करनी पड़ रही है। एक दौर वह भी था जब इस पार्टी के आंदोलन की आंच से दिल्ली सुलगने लगती थी और वार्ता करने के लिए न्योते पर न्योते आते थे। रसूखवाले राजनेता इन्हें मनाने के लिए झारखंड की खाक छानते फिरते थे। हेलीकाप्टर भेजे जाते थे।ड्ढr आज हाल यह कि 10 जनपथ और सात रसकोर्स में घुसने के लिए कई-कई दिनों तक चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसा क्यों हुआ? पार्टी को इसके लिए आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है। पार्टी के वर्तमान सुप्रीमो भी थोपे नेताओं में से नहीं हैं। वे भी एक बड़े आंदोलन की उपज हैं। कुछ साथी बिछड़ जरूर गये हैं। लेकिन ताज्जुब की बात यह रही कि जब भूखे पेट थे तब साथ थे,ाब पेट भरने लगा तो बिछड़ गये। पहले कार्यकर्ता पांव पैदल ही सभास्थल तक तीर-धनुष लिये पहुंच जाते थे,अब गाड़ियां भेजने पर भी नहीं आते। ऐसा नहीं है कि उनके दिन फिर गये हैं, बल्कि वे भी अब चीजों को धीर-धीर समझने लगे हैं। ..वो तन ढारत ढेकुली सींचत आपनो खेतवाले रहीम के दोहे पर अमल करने लगे हैं। निर्मल दा के खून पसीने से सींचे झामुमो का ताना-बाना बिखरने लगा है। काश! आज निर्मल महतो जिंदा होते। (समाप्त)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: और खामोश हो गयी मुखर आवाज