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घाटी और जम्मू के उन्मादियों में फर्क नहीं

श्राइनबोर्ड को जमीन ट्रांसफर का विवाद जहां पंहुच गया है क्या उससे बचने का कोई रास्ता नहीं जा सकता था?ड्ढr एक इंच भी जमीन ट्रांसफर का फै सला नहीं हुआ। न ही वह लीज पर दी गई थी। प्रस्ताव यह था कि हर बरस चंद दिनों की अमरनाथ यात्रा के दौरान यात्रियों की सुविधाओं के लिए अस्थायी तंबू वगैरह लगाने के लिए किराए पर श्राइन बोर्ड को उपयोग के लिए जमीन दी जाए। इसके बदले किराया श्राइन बोर्ड से तय हुआ 2 करोड़ 31 लाख रुपए सालाना। मालिकाना हक ट्रांसफर होता तो फिर किराया क्यों फिक्स होता। कहा जा रहा है कि इसके पीछे वोट की राजनीति थी?ड्ढr जब मुफ्ती साहब मुझ से पहले मुख्यमंत्री थे तब उनकी सरकार ने मार्च 2005 में इस आशय का एक आदेश निकाला था कि श्राइन बोर्ड को यात्रा के दौरान आने वाले लोगों के इस्तेमाल के लिए जगह देनी चाहिए। मई में उन्होंने वापस लिया और सेंट्रल इंप्वारमेंट कमेटी के जरिए मामले को आगे बढ़ाया। कमेटी में कानून व फोरस्ट डिपार्टमेंट व पर्यटन समेत संबद्ध विभागों की राय ली। फारस्ट महकमे के मंत्री भी मुफ्ती साहब की पीडीपी के थे। पहले की व्यवस्था को समाप्त करने की जरुरत क्यों पड़ी।ड्ढr वक्त के साथ यात्रा में बढ़ रही भीड़ और इससे स्थानीय लोगों की भागीदारी व पर्यटन को बढ़ावा देने को अरसे से महसूस किया जा रहा था। सन् 2000 में श्राइन बोर्ड बनाया गया था, नेशनल कांफ्रेंस सरकार फारुख अब्दुला साहब की सरकार ने। मेरी सरकार ने जमीन से जुड़े सभी पहलुओं की सही पड़ताल की। पाया कि कहीं भी कोई अड़चन नहीं तो फिर एक रुटीन मसला मेरी सरकार के सामने आया था। लेकिन आपने नेशनल कांफ्रेस और पीडीपी को भरोसे में नहीं लिया?ड्ढr सन् 2000 में श्राइन बोर्ड बनाया फारुख अब्दुल्ला ने और भूमि यात्रियों के लिए टेंपरेरी सेल्टर बनाने के लिए प्रक्रिया आंरभ की थी। उसी सरकार ने फौरस्ट एक्ट में संशोधन करने की प्रकिया शुरू की। इसका सारा रिकार्ड है। 2005 भूमि देने का प्रस्ताव तैयार किया मुफ्ती सरकार ने। तब भी पीडीपी के मंत्री तारिक अहमद कारा वन विभाग के मंत्री थे और 20 मई 200ो जब केबिनेट ने जमीन किराए पर देने का फैसला पारित किया तो तब भी मेरी सरकार की केबिनेट बैठक में पीडीपी कोटे के उन्हीं के दूसर वन मंत्री थे काजी अफाल। पीडीपी तब समर्थन में थी क्योंकि केबिनेट ने जो प्रस्ताव पारित किया वह उन्हीं का था। रुटीन में सरकार कांग्रेस नेतृत्व में न होकर पीडीपी की होती तो इसी तरह मुफ्ती साहब की कैबिनेट भी जमीन के बार में कदम उठाती। पीडीपी व नेशनल कांफ्रेस जब फैसले में हिस्सेदार थी तो उन्होंने पैंतरा क्यों बदला?ड्ढr असल में 20 मई को मेरी सरकार के के बिनेट के फै सले के बाद घाटी में कुछ अलगाववादी फिरकापरस्त तत्वों ने गुपचुप दुष्प्रचार चलाया। हास्यास्पद प्रचार यह हुआ कि फारस्ट भूमि अमरनाथ यात्रा पर आने वाले लोगों को कालोनियां बनाने के लिए दी जा रही है। हर साल जो यात्री आएंगे उनमे से अधिकतर यहीं बसते जाएंगे। जो इलाका साल में 7-8 महीने बर्फ से ढका रहता है। वहां चंद रो की यात्रा के अलावा कोई मानवीय हलचल नहीं होती, वहां कौन जाकर बसेगा? अलगाववादियों के इसी जाल में फंसकर कुछ लोगों ने उन्मादी भीड़ एकत्र करनी शुरू की। पहले दिन दस- बीस, अगले दिन सौ- दो सौ और बाद में जाकर दो-दो लाख लोग रैलियों में जुटे। बजाय एक जिम्मेदार सियासी पार्टी होने के लोगों को हकीकत बताई जाती, पीडीपी व नेशनल कांफ्रेस भी इसी भीड़ में जाकर समा गए। उन्हें लगा कि इसी भीड़ में उनकी वोटों की फसल लहरा रही है। सर्वदलीय बैठक से क्या होने वाला है?ड्ढr हर समस्या का हल बातचीत होता है। जो लोग घाटी में जमीन यूज के लिए देने को अलगाववादियों के हाथों में खेलने खड़े हो गए थे, उन्हें नहीं पता था कि इसका दूसर हिस्सों में क्या असर पड़ेगा? जम्मू में भी उसी तरह की भीड़ एकत्र की गई। घाटी को जाने वाले रास्तों की नाकेबंदी की गई। घाटी में भारत विरोधी तत्व तो चाहते ही यही हैं कि वहां का हिंदुस्तान से नाता खत्म हो। जम्मू में संघर्ष समिति की आड़ में जो सियासी लोग परदे के पीछे राजनीति कर रहे हैं, उसमें व घाटी में उन्मादी चरमपंथियों में कोई भेद नहीं है।

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