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घटिया दवाओं के नेटवर्क पर नियंत्रण नहीं

राज्य में दवाओं की गुणवत्ता के लिए बना औषधि तंत्र फेल है। दवाओं की गुणवत्ता की जांच के लिए करीब तीन माह पूर्व ड्रग लेबोरटरी का उद्घाटन कराया गया। हालांकि अधिकारियों की सुस्ती के कारण इसे आज तक चालू नहीं किया जा सका है। दवाओं की जांच नहीं होने से राज्य के ड्रग इंस्पेक्टर दवाओं का नमूना नहीं ले रहे। जो नमूना लिया भी जा रहा है, उसकी जांच नहीं हो रही है। कोलकाता स्थित सेंट्रल ड्रग लेबोरटरी ने झारखंड से मात्र 10 नमूनों की जांच करने की अनुमति दी है। राज्य में ड्रग इंस्पेक्टरों की भी काफी कमी है। झारखंड गठन के बाद से पदों के सृजन और ड्रग इंस्पेक्टरों की नियुक्ित प्रक्रिया प्रारंभ नहीं की गयी। केंद्र के सहयोग से नामकुम में बना ड्रग लेबोरटरी सफेद हाथी बन गया है। यहां तकनीशियन और केमेस्टि भी बहाल नहीं हो पाये हैं। सरकार की ओर से बीआइटी मेसरा के केमिस्टों को 600 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से रखा गया था। उपकरण के अभाव में ये केमिस्ट भी दवाओं की जांच प्रारंभ नहीं कर सके। दूसरी तरफ उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों का काम सिर्फ दवा दुकानों का लाइसेंस निर्गत करना या फिर रिन्युवल करना रह गया है। स्वास्थ्य मंत्री की मां नगीना सिंह को घटिया दवा देने का मामला उाागर होने के बाद भी औषधि प्रशासन सजग नहीं हुआ है। राज्य में घटिया दवाओं पर नियंत्रण नहीं होने की बात स्वास्थ्य मंत्री भानू प्रताप शाही ने भी मानी। उनके अनुसार राज्य में बिकने वाली विभिन्न कंपनियों की दवाओं की अनुज्ञप्ति, गुणवत्ता और मूल्य नियंत्रण के लिए केंद्रीय स्तर पर राज्य में प्रवेश बिंदू पर नियंत्रण एवं अनुश्रवण के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इसके लिए उन्होंने पूर्व स्वास्थ्य सचिव को पीत पत्र लिखकर ठोस व्यवस्था करने को भी कहा था। ड्ढr

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